पिछले कुछ दिनों से एक विषय पर मेरी सोच सभी से भिन्न थी। मेरे आस-पास जितने भी भाई, बंधु, मित्र थे..सभी की राय मुझसे अलग थी। कभी-कभी मुझे लग रहा था कि हो सकता हैं मैं ही गलत हूँ। लेकिन मैंने अपनी राय जबरदस्ती किसी को खुश करने के लिए नहीं बदली। और शायद इसी का परिणाम हैं कि आज मुझे अफ़सोस या पछतावा ज़रा भी नही हैं। चलिये बात को घुमाएं बिना मुद्दे पे आते हैं। बात को अच्छे से समझियेगा, हाइपर होने की जरुरत नहीं पड़ेगी।
आज फिल्म "पद्मावती" देखी। मैं इसके रिलीज़ के समर्थन में था और इसके विरोध के विरोध में। फ़िल्म देखने के बाद मुझे सबसे ज्यादा "दया" संजय लीला भंसाली पर आयी की.. ये ऐसा पहला निर्देशक होगा जिसे उनका ही सामना करना पड़ गया जिनके ऊपर उसने पूरी फिल्म को बनायीं। फिल्म का नाम भले पद्मावती हो या पद्मावत लेकिन यकीन मानिये यह कहानी पद्मावती की नही राजपूतों की हैं। राजपूत की शान, राजपूत का साहस, राजपूत का गौरव, राजपूत के उसूल, राजपूत का स्वाभिमान सबकुछ बहुत सच्चाई व बेबाक तरीके से दिखया गया है इस फिल्म में। ऐसा एक भी बार महसूस न होगा की रानी पद्मिनी के चरित्र या उनके स्वाभिमान को कही ठेस पहुचीं हैं। अल्लाउदीन खिलजी बस एक नकारात्मक किरदार भर हैं जो हर किसी फिल्म में होता हैं। वह जैसा था उसे वैसा ही दिखाया गया हैं। अन्त अन्त तक वह रानी को देख तक नही पाता हैं।
तो भैया इतना हंगामा काहे बरपा रहे थे?
राजपूत क्या होते हैं अगर जानना हो तो फिल्म देख लीजिए। फिल्म देखकर आप भंसाली के शुक्रगुजार होंगे। यूँ नकली राजपूत व करणी-फरणी सेना के चक्कर में मत पड़िये। यह आप ही की कहानी हैं..बल्कि आप की नही यह हमारे इतिहास की वह कहानी हैं जिसे न तो हमें पढ़ना होता और न ही कोई दिखाने की हिम्मत करता हैं। यह एक ऐसी कहानी हैं जिसमें रानी पद्मिनी मृत्यु को प्राप्त कर भी सदा के लिए जीवंत हो जाती हैं, राजा रतन सिंह हार कर भी जीते हुए नजर आते हैं, और खिलजी जीतकर भी हारा हुआ।

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