पार के ख़लील
कड़क मिजाजी
April 11, 2020
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हाल-ए-दिल अपना अब मैं कैसे बताऊं समझ नहीं आता सदाए-हक या दुश्मनी निभाऊं टूटने का डर भी तो बचा नहीं मस्हूक का हस्र किसे दिखाऊं कोई ख़्वाहिश न...
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हम हैं कड़क मिजाजी, मास्टर साब वाले कड़क नहीं बल्कि सुबह की चाय जैसे कड़क, जो दिमाग खोल दे, फिरेस कर दे।
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