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Monday, November 5, 2018

क्यो न भारत के मध्यवर्ग का नामकरण शोषितवर्ग कर दिया जाए?



बेबसी और डर, ऐसी भी क्या जो हमें अपने अधिकारों और अन्याय से लड़ने से रोकती हो।
   
  तो चलिए आज बात शुरू करते है मिडिल क्लास और सेमी-मिडिल क्लास परिवारों की समस्याओं से।
क्यों ये दो वर्ग, जो जनसंख्या के लिहाज़ से भारत में सबसे बड़ा वर्ग है,अपने हकों के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करने की बजाए समझौते कर लेने में ज्यादा भरोसा रखता है ?
   
मिडिल क्लास और सेमी-मिडिल क्लास परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके जीविका की होती है, कि वो कैसे दो जून की रोटी का इंतज़ाम कर अपने बाल बच्चों का पालन पोषण कर सके। ऐसे में जब परिवार संभालना ही मुश्किल से हो पाता है तो अपने ऊपर होते शोषण के लिए आवाज़ उठाना कैसे संभव हो सकता है। 

       इन दो वर्गों के सामने एक और चुनौती होती है जो उनके पलायन करने से जुड़ी हुई है। आंकड़ो को देखे तो सबसे ज्यादा पलायन इन दो वर्गों के द्वारा ही किया जाता है। एक बेहतर सपना साकार हो और संभावनाओं की तलाश में ये लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाते है। अपने-अपने गांवो या शहरों को छोड़ कर जब ये लोग नए स्थान पे रोजगार की तलाश में जाते है तब इनके साथ उनका स्वाभिमान यह कहते हुए लहरिया मारने लगता है कि वो अब वापस तभी जाएंगे जब कुछ बेहतर हासिल कर चुके हो। यही स्वाभिमान उनके शोषण की बड़ी वजह भी बनती है।


         इन दो वर्गों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है नौकरी। क्योंकि जिस जिम्मेदारी के बोझ तले वो पलायन करके आये है , उन जिम्मेदारियों का निर्वहन उनकी पहली प्राथमिकता होती है। इसलिए नौकरी पाने के लिए वो शोषण का भी दंश झेलने के लिए तैयार होते है।
       साहूकार, व्यापारी,पूंजीपति तो इनका शोषण करते ही है लेकिन सरकारी सिस्टम भी इनको उतना ही परेशान करती है। चाहे वो राशन की दुकान पर राशन लेने के लिए उनको परेशान करना हो या सरकारी दफ्तरों में इन लोगों को दोयम दर्जे का समझा जाता हो। अपने परिवार के लिए ये वर्ग हर बात को सह लेने में ही भलाई समझता है।
    जब इतनी सारी समस्याएं मुँह बाये खड़ी हो तब हम कैसे इन वर्गों के लोगों से ये उम्मीद कर सकते है कि वो अपने अधिकारों के लिए लड़ सके। जब मूलभूत चीज़े ही उपलब्ध नही होंगी तब वो कैसे अपनी आवाज़ बुलंद कर सकेंगे।
   लेकिन मेरा मानना  और भरोसा है कि बदलाव की लहर इन वर्गों से आने वाले युवा ही लाएंगे। ऐसा उनको करना ही होगा नहीं तो सब कुछ उनके हाथों से सुनियोजित तरीके से छीन लिया जाएगा और उनको एक भीड़ बनाकर छोड़ दिया जाएगा।

भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली से कृष्ण मुरारी द्वारा लिखित।


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