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Sunday, December 9, 2018

अगर "अरेंज मैरिज" का कांसेप्ट ही न होता ?


आज नीचे लिखा हुआ लेख मेरा नही है बल्कि यह एक किताब "आजादी मेरा ब्रांड" का  छोटा सा अंश है जिसकी लेखक "अनुराधा बेनीवाल"जी है। वैसे तो ये किताब एक यत्र वृतांत है लेकिन इसको पढ़ने पर आपको यात्रा के विभिन्न पहलुओं से इतर जिन्दगी के फ़लसफ़े के बारे में भी जानने को मिलेगा।पुरुष प्रधान भारतीय समाज को इस आजाद ख्याली लड़की के यात्रा वृतांत लिखने का तरीका हो सकता है पसंद न आये लेकिन इस पुस्तक को हर महिला को जरुर पढ़ना चाहिए।मुझे किताब का ये लेख किताब की जान जैसा लगा। 
मैं सोच रहा था कि अपने देश में अरेंज मैरिज का होना इस हद तक जरूरी क्यों हो जाता है? सिर्फ इसी हाउसवाइफ के कॉन्सेप्ट के कारण तो? ग्रहलक्ष्मी से घर मालकिन तक की खुशी-यात्रा जो केवल जिम्मेदारियों के निर्वाह की भूमिका है। वरना उसमें और रखा क्या है? कोई विशेष अधिकार या कोई विशेष आजादी? कुछ नहीं।सोचिए,अगर इस अरेंज मैरिज का कोई कांसेप्ट ही नहीं हो,एकदम से खत्म हो जाए यह व्यवस्था तो?


तब तो यह गारंटी ही नहीं होगी कि सब की शादी होगी ही होगी। मतलब,आपको खुद शादी के लिए उस लायक बनाना होगा कि कोई आपको पसंद करे।वे सभी गुण आपको अपने अंदर पैदा करने होंगे जिससे कि कोई आपको अपना जीवन-साथी बनाना चाहे।इससे क्या यह नहीं होगा कि लड़के-लड़कियां आपस में बातें करना सीखेंगे,एक दूसरे को एक दूसरे के लायक बनाना सीखेंगे?अभी जैसा तो नहीं ही हो सकेगा की लड़के ने पूरी उम्र किसी लड़की से बात ही ना कि हो,या राह चलते सिर्फ कमेंट ही पास किये हो,किसी लड़की को दोस्त तक न बनाया बनाया हो,या किसी लड़की का हाथ पकड़ने तक का शऊर न हो उसे,ना ही किसी से प्रेम करना सीखा हो उसने, फिर भी वह शादी को लेकर बेफिक्र रहे।क्योंकि उसे पता है कि वो जैसे ही कोई नौकरी पा लेगा या उसके घर में ठीक-ठाक इतनी जमीन है कि उसको बीवी कैसे भी मिल ही जायेगी।आखिर एक लड़के को एक लड़की के साथ बेहतर जीवन जीने की तैयारी पहले से क्यों नहीं करनी चाहिए?


ठीक उसी तरह उसी समाज में एक लड़की भी है कहीं जिसने कभी किसी लड़के से बात ही नहीं की है,उसने ना किसी को दोस्त बनाया है ना उसने घर बसाने का कोई ढंग-ढर्रा सीखा है,ना खुद घर के इंतजाम करने की कोई कोशिश की है,ना अपने घर के सब बिल भरने का सलीका है। क्योंकि उसको भी पता है कि ठीक समय आने पर उसके मां-बाप या रिश्तेदार उसको एक बसा-बसाया घर दिलवा ही देंगे लेकिन अगर उसे इस बात की गारंटी नहीं दी गई होती, अगर उसको बना-बनाया घर या किसी घर बनाने वाले के साथ ब्याहने का प्रॉमिस नहीं किया गया होता तो शायद वह उस दिशा में खुद मेहनत करती। आत्मनिर्भर होती और निर्णय लेने की क्षमता भी उसमें बेहतर होती।
खैर,जो है सो है। मैं भी कहीं का दिमाग कहीं दौड़ाने लगता हूँ। इस व्यवस्था के भी जरूर कुछ कारण रहे होंगे और उसके भी।और बदल तो रहे ही हैं न धीरे-धीरे,यह भी और हम भी। एक दिन इंसान ऐसे ही इवॉल्व होते-होते एकदम परफेक्ट हो जाएगा,या फिर ख़त्म ही हो जाएगा।

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