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Tuesday, March 10, 2020

शुभ होली मित्रों

होली के रंगीन मस्ती में एक रंग कड़क मिजाजी की ओर से !!
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            शोर होने लगा है, मदिरा पानी कि तरह पीये जाने लगे हैं। पुआ-मालपुआ गपागप गर्दन की ऊंचाइयों से होते हुए पेट की गहराइयों के भव सागर में विलुप्त होने लगी हैं। बड़े, दही के सागर में कलाबाजियां करना सीख ही रही होते हैं कि उनकी भ्रूण ह्त्या कर दी जा रहीं हैं। दो मृदंग फाड़ कर बदले भी जा चुके हैं। होशियारों का एक जत्था अभी तुरंत ही गली से अपनी सलामी देकर गुजरा हैं। दूसरा जत्था बिन मौसम बरसात की भाँति कभी भी टपक सकता हैं। खुद को इन खिलजियों से बचा पाना पॉकेट मनी बचाने जैसा हैं। 

कलुआ छः साल का हुआ हैं नाली में शीर्षासन करने का सौभाग्य उसे पहली बार प्राप्त हुआ हैं । उधर धनेशरा परेशान हैं कि उसका बेटा जो भांग की गोलियां लाने गया हैं या अच्छे दिन जो मिले ही नहीं। 
पूरा गांव रंग बदल रहा हैं मगर हरिहर का बेटा फिर राजधानी से नहीं लौटा।। सुना हैं अफसरी पढ़ाई करता हैं । यहीं हाल सांवरिया का भी हैं उसका मरद फौज में जो हैं! सुना हैं शरहद पर दीवाली और होली साथ में मनाई जाती हैं। इधर फुलझरिया की शादी के बाद ये पहली होली हैं ।क्या हुआ नहीं चीन्हे? अरे अपने भेस्पा की बहुरिया जो अभी दुइ महीना पहिले ही बियह के आयी हैं । 

अच्छा वो सब छोड़ो! सुना हैं रमेशवा ललिया छुपन छुपाई खेल रहे थे और पूरे गाँव वालों ने उन्हें इस तरह धप्पा कर दिया जैसे देशवासियों ने कांग्रेसियो को आम चुनाव में किया था।
ख़ैर किसको फर्क पड़ता हैं आम की डाली में बैठी कोयल बताने की कोशिश में लगी हैं कि इस साल फिर पिछले साल की तरह सूखा पड़ने वाला हैं मगर डी•जे• की मधुर और धीमी आवाज में निकलता स्वर भतिज्वा के मैयो जिंदाबाद और मौसियों जिन्दाबाद कोयल की कर्कश कूँक को दबा सा दे रही हैं। 

यक़ीनन अब होली में कान्हा को कम याद किया जाता हैं खेसरीया को ज्यादा याद किया जाता हैं। भोजपुरी का भी यहीं हाल हैं जो गाता हैं अश्लील ही गाता हैं। कजरी ,फागुनी गीत मिस्टर इंडिया की तरह ग़ायब ही हो चुके हैं।
होली भी कमाल का त्योहार हैं नहीं खाने वाला भी वित्त मंत्री की तरह प्याज खाने लगता हैं और खाने वाले तो आजकल गाय को न खिला कर खुद ही सारा चारा खा जा रहे हैं। 

होली आने से एक साल पहले से ही पानी बचाने का कुक्कुर विलाप शुरू हो जाता हैं ।अच्छी बात हैं पानी बचाना चहिये मगर मेरा मानना हैं देश भी बचना चाहिए। इन क्लोरोफ्लोरो कार्बन वालो पर ये पानी बचाने वाली बात पाकिस्तानियों के मुँह से आतंकवाद मुर्दाबाद जैसी लगती हैं।
होली के रंग में रंगते-रंगते अब हम इतना काले पड़ चुके हैं कि अब कोई रंग नही चढ़ता हैं। पर्व त्योहारों की रौनक पर अब वो वास्तविक रंग कहाँ नज़र आता हैं सब कुछ काल्पनिक ही लगता हैं।
     क्या लगता हैं जब करुआ बड़ा होकर बेरोजगार बनेगा तो शीर्षासन का सुख भोग पायेगा। धनेशरा की खुशी भी बस भांग उतरने तक ही रहेगी जब बैंक उसे डिफॉल्टर घोषित कर देगी। अब कहा इन हरिहरो का बेटा घर लौट पाता हैं। ऐसी सांवरिया कहा कभी कोई होली खेल पाती हैं। फुलझरिया की मेहंदी भी दहेज की आग में झुलसा दी जाएंगी। क्या लगता हैं रमेश और लाली की होली को ये समाज स्वीकारेगा। 
देखना मज़ेदार होगा! दूसरा जत्था कब आता हैं!

  तबतक आपलोग रंगों में सराबोर होइए, बाबा के नाम पर भांग का सेवन कम कीजिये, और बगल वाली भाभियों को इतना न रंगिये कि भैया ही खिसिया जाए ।।।

आपको और आपके परिवार को रंग बिरंगी मस्ती से भरी हुई होली की शुभकामनाएं।।
शुभहोली
जयहिंद।
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- अली

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