कड़क कहानी : "महत्वाकांक्षाओं के भंवर में" - KADAK MIJAJI

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Sunday, April 12, 2020

कड़क कहानी : "महत्वाकांक्षाओं के भंवर में"

कहानियों के अनुभाग में आज कड़क कहानी के रूप में प्रस्तुत है तान्या झा द्वारा लिखित "महत्वाकांक्षाओं के भंवर में "

                     क्षय एक नामी कंपनी में कार्यरत था। बहुत ही महत्वाकांक्षी था वो। हमेशा सबसे आगे रहने की चाह ।साथ ही साथ उसका स्वभाव भी बहुत अच्छा था। आकर्षक व्यक्तित्व का धनी अक्षय ऑफिस में सबका प्रिय था। वहाँ उसकी पहचान एक सक्षम नेतृत्वकर्ता और कुशल वक्ता के रूप में होती थी। और हो भी क्यों ना, बचपन से ही वो पढ़ाई में इतना अच्छा था। बहुत ही लाड़-प्यार से बड़ा किया था मिस्टर और मिसेज खन्ना ने अपने इकलौते बेटे को। शादी के पंद्रह साल बाद अक्षय का जन्म हुआ था। पूरे परिवार का लाडला था वो। कुछ वर्ष पूर्व ही उसके पिताजी की मृत्यु हुई थी।


अपनी उम्र के बाकी लड़कों की तुलना में वो काफी आगे निकल गया था पर इस आगे बढ़ने की दौड़ में वो अपनी माँ से भी काफी दूर हो चुका था। मिसेज खन्ना की भी उम्र होती जा रही थी। उनकी बूढी आँखें रोज़ अक्षय का इंतज़ार करतीं पर उसके पास तो इतना समय ही नहीं था कि वो अपनी माँ का इंतज़ार, बढ़ती उम्र और उनके चेहरे पर फीकी पड़ती चमक को देख सके। जब उनसे नहीं रहा गया तो एक दिन उन्होंने अक्षय से कहा- बेटा कभी तो मेरे लिए भी समय निकाल। उनकी बात को बीच में ही काटते हुए अक्षय बोल पड़ा- माँ तूने ही तो सिखाया था कि हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिये। इतना कह कर वो ऑफिस चला गया। उसकी माँ सोचने लगी, बेटा तुझे माँ की कही हुई बात याद है पर माँ नहीं। 



एक दिन अक्षय अपने दोस्तों के साथ घूमने जा रहा था। वो घर से निकल ही रहा था तो कामवाली बोली कि माँ जी को तेज़ बुख़ार है। वो उनके कमरे में गया तो वो बोलीं बेटा आज तू कहीं मत जा। इस पर अक्षय कहने लगा, माँ घबराओ मत, ज़रा सा बुखार है। कल तुम्हें डॉक्टर से दिखा दूँगा, आज जाने दो। तू जल्दी सो जाना और मेरा इंतज़ार मत करना। ये कहते हुए वो चला गया।पर जब तक वो वहाँ पहुँचा तब तक उसके सारे दोस्त निकल चुके थे। उसे बहुत बुरा लगा कि उन्होंने उसका इंतज़ार तक नहीं किया। सहसा उसके दिमाग में कौंधा माँ तो रोज़ मेरा कितना इंतज़ार करती है। अक्षय की भावनाओं पर जो बर्फ जम गया था वो क्षण भर में पिघल कर आंसुओं के रूप में बहने लगा। बिना देर किये वो अपनी माँ के पास पहुँचना चाहता था। रास्ते में उसने अपनी बीमार माँ के लिये कुछ फल खरीद लिए।

दरवाज़े पर का नज़ारा देख कर वो स्तब्ध रह गया। फलों के पैकेट पर से उसकी पकड़ ढीली पड़ गयी। उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उसकी नज़रें उस भीड़ में बस अपनी माँ को तलाश रही थीं। वह दौड़कर अंदर पहुँचा। उसने अपनी कामवाली से पूछा क्या हो रहा है ये सब। तभी पीछे से उसकी माँ बोली कि बेटा तू तो इतना व्यस्त हो गया है कि तुझे अपना जन्मदिन भी नहीं याद। मैंने सोचा कि वैसे तो तू रुकेगा नहीं इसलिए बुखार का बहाना बनाया पर वो भी बेअसर रहा। फिर तेरे दोस्तों से बात की और नतीजा तेरे सामने है। अक्षय ने एक बार फिर अपने घर को निहारा। कितनी सुन्दर सजावट, ठीक उसी तरह जैसे बचपन में उसका जन्मदिन मनता था। कितने सारे सगे-सम्बंधी भी तो आये थे जिनसे वो ना जाने कितने समय बाद मिला था। वो ये सब सोच ही रहा था कि पीछे से उसके दोस्त बोल पड़े- यार अक्षय, तूने कभी बताया ही नहीं कि आंटी इतनी मज़ाकिया हैं। वो बताता भी तो क्या, उसे तो ये तक नहीं याद था कि उसने अपनी माँ को आखिरी बार हँसते हुए कब देखा था। सबके जाने के बाद वो किसी छोटे बच्चे की तरह अपनी माँ से लिपट गया और बोल पड़ा- माँ मुझे माफ़ कर दे। उसकी माँ ने बहुत प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहने लगीं कि बेटा तुम्हारे पापा और मैं कभी नहीं चाहते थे कि पैसे कमाने की अंधी दौड़ में तू भी शामिल हो। अगर आज पैसे नहीं हैं तो क्या कल आ जाएंगे पर कोई अपना अगर एक बार दूर हो जाए तो कभी वापिस नहीं आएगा। पर- बात अधूरी ही थी कि अक्षय बोल पड़ा- माँ मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया है। अब कभी तेरा दिल नहीं दुखाऊंगा।


अगली सुबह थकान के कारण प्रोमिला जी की नींद ज़रा देर से खुली। वो कमरे से निकल ही रही थीं कि सामने अक्षय चाय-बिस्किट के साथ खड़ा था। "चलो माँ साथ चाय पीते हैं।" इन छः शब्दों में ऐसा जादू था कि प्रोमिला जी की जाती हुई चमक दोगुनी ख़ुशी के साथ उनके चेहरे पर वापस लौट आई।
तान्या झा
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