विस्थापित होता जीवन-मरण
......................................
एक गाँव के डूबने की ख़बर
सिर्फ गाँव की ख़बर नहीं होती
यह होती है राष्ट्रीय ख़बर
ख़बरनीशों को पता होता है
कि अब कौन गाँव डूबेंगे
सूंघते हैं वे उस ख़बर को
जिस ख़बर से आती हैं
पुआल की सडांध
नाक सिकुड़ जाते हैं खुद-ब-खुद
मरे हुए मेमने की दुर्गंध से
तभी कोई संवाददाता
डीजे की धुन पर
यह कहते हुए अवतरित होता है
मैं बोल रहा हूँ फलाना कुमार सीधे कोसी से
समाचार कोसी के होते हैं
जिसमें बह रही होती हैं
माँ की हँसुलियाँ..
माँ की सिंदूर की डिबकी
तैयार किया जाता है फ़ीचर
उन दृश्यों का
जिन दृश्यों में पटे होते हैं सडे हुए लाश...
ख़बर वह होती है
जहाँ बदबू देता है सड़ा हुआ अनाज
ख़बर वह होती है
जहाँ रोते हैं गुम हुए भूखे बच्चें
जिस ख़बर से ध्वनित होती हैं
बैलों की घंटी की मृदुल ध्वनि
वे भाँप लेते हैं कि
विस्थापन के क्रम में बैलें
कूच कर चुके हैं फरकिया से बाहर...
एक गाँव के डूबने की ख़बर
सिर्फ गाँव की ख़बर नहीं होती
यह होती है राष्ट्रीय ख़बर
क्योंकि फरकिया से सिर्फ
विस्थापित नहीं होते बैलें
विस्थापित हो जाता है जीवन-मरण....
यह कविता हमारे सहयोगी चंद्रशेखर कुमार ने लिख भेजी है, जो फिलहाल भारतीय जन संचार संस्थान , नई दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं।
जुड़े रहिये हमारे फेसबुक पेज कड़क मिजाजी से


No comments:
Post a Comment
आपको यह कैसा लगा? अपनी टिप्पणी या सुझाव अवश्य दीजिए।