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Thursday, August 23, 2018

कविता- "हमारे अंदर कोई है"



"हमारे अंदर कोई है"
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हमारे अंदर कोई है, 
सच में कोई है,
जो रोकता है हमें निष्पक्ष होने से,
टोकता रहता है, क्यों कर रहे हो ये सब?
लोकप्रिय होने के आसान नुस्ख़े बताता है,
और सवालिया निशान लगाता है हमारे ऊपर ।

कोई है ,
जो मुझे कहता है अब और नहीं,
क़दम को रोक देता है
जैसे जंजीर बंधी हो,
धड़कन को बेवजह मरोड़ता रहता है,
मुझे कहता है,
गुस्ताख़ी माफ नहीं की जाएगी,
और करता है प्रयास मुझे झुकाने का ।

कोई है 
चेतन,अवचेतन और अचेतन में भी,
वो है हमारे नजरिये व मानसिकता में भी,
जो अपनी छाप छोड़ता रहता है दिमाग की नसों में,
खुजलाहट जब भी होती है माहौल को देख कर,
वो थप्पड़ जड़ता है ,
और कहता है सब ठीक है ।

कोई है 
हमारे अंदर जो हैवानियत को बढ़ावा देता है,
हमें बनाता रहता है मूर्ख,
धर्म,जाति,रंग और क्षेत्र में बाँटता रहता है ,
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाई में छांटता रहता है,
और कहता है 
यही सच है ।

कोई है
हमारे अंदर जो माइंड वाश करना चाहता है,
भटकाना जानता है मुद्दों से वो,
लेफ़्ट व राइट कि रस्सी से हमें बांधे रखता है,
करता रहता है हमारा दुरुपयोग 
परजीवी की तरह,
और कहता है 
चुप रह बेवकूफ़ क्रांति मत कर ।

कोई है
जो हमें पढ़ता है,
और हाँ हमारी डिमांड को भी जानता है,
परोस देता है हमारे अनुसार बोटियाँ,
सहलाता है कुछ देर के लिए ज़ख्म को,
और हम हो जाते हैं
 दिमाग रहित अंधे ।

जब भी हम कुछ अलग सोचते हैं,
या फिर अलग करते हैं,
अंदर की वह नेतृत्वकर्ता मजबूर करती है-
अलग एंगल से सोचने व करने के लिए,
और हो जाता है वो अपने मिशन में कामयाब ।

कोई है
 हमारे अंदर जो बना है
द्वेष,हिंसा,स्वार्थ व अवसर से,
हम बहते जाते हैं बिन सोचे अनवरत,
वो करता रहता है चौबीसों घण्टे अपना काम,
और एक दिन पटक देता है 
चट्टानों पर हमें ।

राहुल कुमार 'दोषी'
भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली

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