ये सच है कि हम सच कम बोलते हैं। पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस ने जॉनसन एंड जॉनसन से संबद्ध कंपनी का 2013 तक भारत में मरीज़ों की सर्जरी के लिए प्रयोग किए गए अनुपयुक्त उपकरणों पर एक लेख छापा। कंपनी ने स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में ये माना कि मरीजों को सर्जरी के बाद आई समस्याओं में उनके उपकरणों की भूमिका थी|
इसमें सच इतना ही था कि 2010 में अमेरिका ने जब ये उपकरण प्रतिबंधित कर दिये थे तब भी 2013 तक कूल्हे की सर्जरी करवा रहे हिन्दुस्तानी मरीजों के अस्त्रोपचार में इन्हें इस्तेमाल किया गया| भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था पर निगाह रखने वाले हर एक भारतीय को समझना चाहिए कि जब कोई अखबार लंबी रिपोर्टों का अध्ययन कर कोई एक्सक्लूसिव खबर छापता है तब उसे पढ़ना उनका कर्तव्य होना चाहिए| एक विदेशी कंपनी के उपकरण से जब 4 लोगों कि मौत हो जाए, 100 से अधिक को संशोधन सर्जरी करवानी पड़ जाए और 2018 में जाकर पीड़ित परिवारों की चिट्ठियों का संज्ञान लिया जाए तो ये दुखद है| देश-दुनिया में संचार क्रान्ति चल रही है लेकिन मंत्रालय को होश आया इतने सालों बाद!
इससे इतर भीमा-कोरेगाँव हिंसा पर हुई 5 गिरफ्तारियों पर देश में खूब चर्चा हुई| धारणाओं के आधार पर दो पक्ष बन गए| सियासत के रण में वाद-विवाद शुरू हो गया| ऐसे में सच की मांग का बढ़ना लाजिमी था| मीडिया में रोज़ सच ढूँढने को संघर्ष होता है| फिर हैरानी होती है जब रात 9 बजे एक ऐंकर "उसने क्या कहा" पर चर्चा करता है|
आपको मालूम होना ज़रूरी है कि जॉनसन ऐंड जॉनसन द्वारा उत्पादित अनुपयुक्त उपकरणों के कारण कई मरीजों के कूल्हे का दर्द बढ़ गया और मानसिक स्वास्थय पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा| करीब 3000+ मरीजों का पता तक लगाया नहीं जा सका है| कंपनी अब पहचाने गए मरीजों को संशोधन सर्जरी के लिए वित्तीय राहत देगी| ऐसे में ये सवाल उठना लाज़मी है कि क्या भारत में अमेरिका की तरह स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का विनियमन हो सकता है?
जब समाज को प्रभावित करते इतने बड़े सच का पर्दाफाश हो और वह कुछ ही गलियारों में दब कर रह जाए तो इससे हमारा चरित्र पता लगता है| सस्ते अखबारों में यह खबर कहीं कोने में दाबी रही तो टीवी में कुछ ही चैनलों ने इसे चलाया| ये बात सच है कि जान गंवा चुके उन 4 लोगों का जीवन लौटने वाला नहीं है, मगर उनके और अन्य पीड़ितों के परिवार वालों ने वह साहसी चिट्ठी लिखकर एक बड़ा काम किया है| इससे कंपनी का क्या होता है, पता नहीं...
मगर जब पूंजी से नहाई कोई बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी अपनी कड़क छवि को बचा नहीं पाई तो ये ध्यान रखें कि सच का मिजाज भी कड़क है|

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