सिर्फ 5 साल ही तो हुए हैं कितना कुछ बदल गया!जीवन सिंह खड़ा मेट्रो स्टेशन पर बनी कलाकृतियां एक टक देख रहा है।वह अक्सर इन्हें ही देखा करता है,ऐसे देखता है जैसे उन्हें अपने भीतर उतार रहा हो।
...5 साल पहले जीवन सिंह का जीवन भी क्या जीवन था । एकदम बिंदास हरा भरा सबको भर- भर के ऑक्सीजन देता था। गोविंद अंकल कि चाय की दुकान, जो आज बड़ी टी शॉप हो गई है। कभी इसी के नीचे हुआ करती थी और आमिर अंकल जिनका आज यहां प्रगति प्लाज़ा में बड़ा सेलून हो गया है उन्होंने यहीं जीवन सिंह की छाती में शीशे को टांग कर रोजी-रोटी कमाना शुरू किया था।बड़ा ही गजब माहौल बनता था!रोज शाम को दिन भर के काम से थके हारे लोग यहां चाय की चुस्की के साथ अपनी थकान छोड़ जाते थे।
जीवन सिंह ने अपनी ज़िंदगी के कितने ही बसंत देख डाले थे,न जाने कितने ही बसंत आये और गए। पर अपना जीवन सिंह फक्कड़ मिज़ाज़ उसको क्या लेना देना इन सब से ! वो तो अपनी धुन में मस्त रहता। पर एक दिन भरे तूफान में उसके जीवन में बसंत उतर गया जिसने उसके जीवन में क्लोरोफिल से ज्यादा हरापन ला दिया। वो दिन था भरी आंधी और तूफान का जब उसके सामने सड़क के किनारे खड़ी सांसी देवी आंधी के कारण अपना संतुलन खो बैठी और जमीन की ओर लगभग इस तरह झुक गई जैसे अभी उसकी जड़ें धरती छोड़ देंगी । उसकी दो-तीन डालियाँ भी छितर के दूर जा गिरीं तभी जीवन सिंह ने उसे सहारा देते हुए गिरने से बचा लिया था और जब तक तूफ़ान थम नही गया उसका सारा भार अपने ऊपर रखा। दिन भयंकर तूफ़ान और त्रासदीपूर्ण था लेकिन उसने जीवन सिंह के जीवन में बसंत ला दिया था। सांसी देवी ने उसको उस दिन शुक्रिया कहा था। तब से उस रोबीले,फक्कड़,तगड़े,तंदुरुस्त शरीर में गज़ब का शर्मीलापन प्रवेश कर गया था। फिर तो क्या था जैसे अपनी सबसे ऊंची फुनगी से आसमान में सबसे नये तरह का इंद्रधनुष रच देना चाहता हो।अब तो वह सारा-सारा दिन बस सांसी देवी को ही निहारा करता सांसी देवी भी कभी कभार अपने बड़े-बड़े सुंदर चटख सफ़ेद फूल उस पर गिरा देती थी। जिससे उसके शरीर में क्लोरोफिल की मात्रा दुगनी हो जाती थी।उन फूलों को वह कभी ज़मीन पर नहीं गिरने देता था।बदले में वह कड़ी धूप में सांसी देवी पर शीतल छाया बनाए रखने की कोशिश करता रहता था।
धीरे-धीरे उनके संबंध प्रगाढ़ हो रहे थे पर इसी बीच वहां अजीब-सी हलचल शुरू हुई जिसने जीवन सिंह का जीवन स्थिर-सा कर दिया। इस हलचल का असर सभी पर देखा जा सकता था।हर कोई न जाने कैसी चिंता भरी भागम-भाग में पड़ा दिखता।देखते ही देखते उसके आसपास सब कुछ विलुप्त हो चुका था।उसकी छतनार-सी छाया को छोड़ कर गोविन्द अंकल अपनी चाय की दुकान और आमिर अंकल अपनी नाई की दुकान समेटकर जा चुके थे।कभी जहाँ इतनी चहल-पहल रहती थी आज सब उजाड़- सा लग रहा था। जहाँ वो और उसके साथी नितांत अकेले हो गए थे।देखते ही देखते वहां बड़ी-बड़ी मशीनों का तांता लग चुका था।टाई लगाने वाले बड़े-बड़े इंजीनियर से लेकर फ़टे जूते पहनने वाले मजदूर भी खूब जुटने लगे।जीवन सिंह को इतना तो पता ही था कि कुछ न कुछ अनिष्ट होने वाला है। क्योंकि जब-जब उसने ये टाई वाले और फ़टे जूते पहनने वाले इन मजदूरों को एक साथ देखा है तब तब कुछ गलत ही होता आया है।
वहां तेजी से खुदाई का काम शुरू हो गया और काम बढ़ते -बढ़ते सांसी देवी के पास आकर रुक गया और चर्चाएं शुरू हो गईं।फैसला लिया गया कि कल इस पंक्ति के सभी पेड़ों को काटकर काम आगे बढ़ाया जाएगा।उस दिन सांसी देवी जितनी भयभीत हुई थी उससे कहीं ज्यादा जीवन सिंह भीतर तक कांप उठा था।उस दिन उसकी आंखें शायद जीवन में पहली बार नम हुई थीं।जीवन सिंह पूरी रात न जाने क्या-क्या सोचता रहा सांसी देवी उससे बात करना चाहती थी कि जो पल बचे हैं उन्हें ही जी लिया जाए पर जीवन सिंह को न जाने क्या हो गया था उसने उससे कोई बात नहीं की पूरी रात न जाने कहाँ खोया रहा।
सुबह हुई मजदूर आये, अधिकारी आये, उन्होंने उस खुरदुरी उबड़-खाबड़ हो चुकी ज़मीन पर बहुत सारे सुंदर बड़े-बड़े सफ़ेद फूल बिखरे पाए। जिनकी खुशबू किसी को भी सब कुछ भुला कर एक पल ठहर जाने को विवश कर सकती थी।वो फूल आज जीवन सिंह ने गिराए थे जिन्हें वह कभी गिराता ही नही था सांसी देवी उसके ऊपर जितने भी फ़ूल गिराती थी उन्हें अपनी टहनियों में समेटे रखता था। लेकिन आज उसने सारे फ़ूल जमीन पर गिराए थे एक भी अपने पास नही छोड़ा था।उन फूलों की ख़ुशबू से वहां के अधिकारी से लेकर मजदूर तक सभी अचंभित थे।इसे देखते हुए काम एक दिन और नहीं हुआ और अगले दिन फैसले में फेरबदल करते हुए ये तय किया गया कि सभी वृक्षों को काटने या उखाड़ने की बजाए उनका पुनः एक अनुकूल स्थान पर प्रत्यारोपण किया जाएगा।सभी पेड़ों को एक- एक कर पूरे ध्यान से विस्थापित किया गया। जब सांसी देवी को ले जाया जा रहा था तब जीवन सिंह सांसी देवी को देखने की बजाये उन ज़मीन पर बिखरे फूलों को ही निहार रहा था मानों उनसे जवाब मांग रहा हो कि फिर कहाँ कब मिलोगे!
आज 5 साल बाद यहां की काया पलट चुकी है जहां सांसी देवी हवा में खूब बलखाती थी और अपने चटख सफेद फूल जीवन सिंह पर बरसाती थी वहां आज बड़ा मजबूत-सा मेट्रो स्टेशन बन गया है जिसके ऊपर मेट्रो सुबह-शाम सरपट दौड़ती है।आसपास कितनी ही बड़ी- बड़ी इमारतें उग आईं हैं वातावरण में अब गज़ब की चकाचौंध रहती है। मेट्रो स्टेशन को काफी आकर्षक बनाया गया है उसकी दीवारों पर बड़े-बड़े सुंदर सफ़ेद फूल और बिल्कुल सजीव लगने वाली पत्तियां बना दी गई हैं।लोग अक्सर इस मेट्रो स्टेशन को निहारने के लिए रुक जाते हैं और जीवन सिंह जब भी अपने सामने खड़े इस मेट्रो स्टेशन को देखता है तो उसे अपनी सांसी की याद आने लगती है । और सोच में फिर डूब जाता है मानों अब सोचता हो कि इनमें वो खुशबू आ सकती है क्या?
ये रचना हमें लिख भेजी है आशुतोष ने। आशुतोष फिलहाल भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं।


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