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Wednesday, September 19, 2018

मोहब्बत-जिससे डरता है ये समाज



प्यार जो दुनिया को एक सूत्र में,एक धागे में बांधे रखता है वो प्यार केवल प्रेमी-प्रेमिकाओं वाला ही नहीं होता है,जो इस दुनिया,देश,प्रदेश,समाज को जोड़कर रखता है।प्यार एक जीव से दूसरे जीव के बीच होता है,प्यार एक समुदाय से दूसरे समुदाय के बीच होता है,प्यार एक जाति से दूसरी जाति के बीच होता है,प्यार जो मां को बेटे से,पिता को पुत्र से,भाई को बहन से ,भाई को भाई से जोड़कर रखता है और समाज में ये पूर्णतयः बिना रोक-टोक के स्वीकार भी किया जाता है।अस्वीकार रूपी भावना की आग तो वहाँ दहक उठती है जब ये प्यार  दो जिस्मों के बीच होती है,दो युवा और जवाँ दिलों के बीच होता है तब ये आग ज्वालामुखी का रूप धारण कर लेती है और समाज को उसकी संस्कृति का उसमें जल जाने का भय सताने लगता है। 
समस्या तो यहाँ है कि जब समाज में प्यार करने वाले युवाओं के परिवार वालों को अपने प्यार करते बच्चों से उतनी समस्या नहीं होती है जितनी इस तथाकथित प्रगतिशील समाज से होती है।क्योंकि परिवार वालों को  डर तो इस बात से होता है कि ये समाज इस प्यार को गलत नजरों से देखेगा औऱ भविष्य में उसको लेकर ताने मरेगा की अरे इसकी लड़की या लड़का तो किसी के साथ भाग गई/गया, बदचलन है,अपने
माँ-बाप की नाक डुबो दिया फिर वो तथाकथित प्रगतिशील समाज उस परिवार से अपना संबंध बनाने में भी कतरायेगा।

वही प्यार जिसको ये समाज स्वीकार नही करता है वो जब कभी-कभी खुला आसमान पाता है तो खुलकर अपनी मोहब्बत का चिल्ला-चिल्लाकर इस आसमान तले इजहार करता है फिर वो इजहार अलग-अलग जगहों पर इस्तेहार की तरह होते है,कहीं ऐतिहासिक इमारतों की दीवारों पर,कहीं पेड़ों पर,कहीं मंदिरों में धागे की गांठ मारकर,पुलों पर ताले लटकाकर,क्लास की मेजों पर उनकी कहानियां लिखी होती है।ऐसी ही कहानियों के उदाहरण हमें दिल्ली के हौजखास झील किनारे बने एक अत्यंत पुराने किले में देखने को मिलते हैं जिनकी दीवारों पर आशिकों ने अपनी मोहब्बत का खुलकर इजहार किया है।हाँ ये जरूर है कि हमारी पोस्ट कथित भारतीय संस्कृति का उल्लंघन करने वाली है वही संस्कृति जिसमें प्रेम के प्रतीक भगवान श्री कृष्ण को प्रेम का देवता माना गया है जिनकी जन्माष्टमी को अभी कुछ ही दिन पहले हम भारतीयों ने बड़े धूमधाम से मनाया है।

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