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Monday, September 24, 2018

हर शहर में बसता है इक गांव ,वो गांव जो जिंदा रखता है शहर को।

हर शहर में बसता है इक गांव ,वो गांव जो जिंदा रखता है शहर को।
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 कहते हैं कि कोई भी शहर या गांव बनता है वहां के लोगों से। अगर ये सच है तो ट्रैफिक में लालबत्ती पर अटकी दिल्ली को देखकर इसकी बेचैनी का अंदाजा लगाया जा सकता है। कंक्रीट की विशालकाय इमारतें जब सपनों को कुचलने दौड़ती हैं, तब जान बचाने को भागती है ये दिल एकांत की ओर। उस एकांत कि ओर, जो कभी रगों में दौड़ती थी इस दिल्ली की।

 ऐसा लगता है कि दिल्ली जैसे हर शहर में बसता है इक गांव, वो गांव जो जिंदा रहता है उस शहर को। 

                पर ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुझे या आपको ऐसा लगता है। बेचारी दिल्ली भी परेशान है इस शोर से। नौ से नौ की मजदूरी के बाद इंसान सिर्फ शरीर से ही नहीं हारता। वो हार जाता है अपने मन से भी। फिर वो बन जाता है एक मोटर कार। जिसमें जब तक ईंधन है तब तक वो चलती रहेगी।

    इस क्रम में पहले वो गला घोंटता है अपने सपनों का। फिर फर्क भूल जाता है प्रेम और संभोग के बीच। फिर वो इंसान रह हीं कहाँ जाता है।

            वो बन जाता है एक गुब्बारा, गुब्बारा जिसे इंतजार है अपने फटने का। 
पर ये 'वो' कौन है?
ये 'वो' , वो नस्ल है जिसे जीना था आज़ाद होकर। जिसे पूरे करने थे कुछ सपनें, निकलना था जिसे एक अंजान सफर पर। लेकिन वो बनकर रह गया महज़ एक दिहाड़ी मजदूर।

पर देखना एक दिन वह जरूर फटेगा। फटेगा इस भागदौड़ से, लालबत्ती की झंझट से,  बॉस की डांट से, असाइनमेंट की चिक-चिक से, सरकार के धोखों से, अखबार के धंधों से,प्राइम टाइम के शोर से और इस शहर से । 

और फिर वो भागेगा एक गांव की तरफ । हौज खास, किशनगढ़, संजय वन , कश्मीरी गेट या फिर जंगलों की तरफ । जहां आकर उसे लगेगा कि शहर में कितनी कम ऑक्सीजन है , शायद इसलिए उसे होती है घुटन वहाँ। या शायद जितनी भी ऑक्सीजन बची है शहर में, क्या ये गांव ही सप्लाई करते हैं उसे। 

              हौज खास या ऐसे किसी भी गांव में न जाने क्यों लगता है जैसे ठहर जाना कभी-कभी कितना सुख देता है। वो ढूंढने लगता है पुराने किले के गुम्बदों के अंदर की शांति शहर में भी। शहर क्यों इतना शांत नहीं रह सकता?

 नहीं चाहिए उसे अब प्रमोशन, न बोनस, न इंक्रीमेंट।  वो बस चाहता है कश्मीरी गेट झील के उस पार के पेड़ पर बैठे कबूतरों की तरह हो जाना। कबूतरों का जोड़ा बन जाना। और चाहता है कि सिमट जाए ये दुनिया उसी डाल के नीचे, जिस डाल पर बैठे हो "वोदोनों", इनवर्टेड कॉमा के बीच, बिना किसी स्पेस के।

 एक दिन की जिंदगी भी बरस भर की लगती है इन गांवों में। शायद इसलिए हीं अब तक जिंदा है दिल्ली, शायद इसलिए उतना हीं जरूरी है गांवों का भी जिंदा रहना।
क्योंकि हर शहर में बसता है एक गांव, वो गांव जो जिंदा रखता है शहर को।

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