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Sunday, October 7, 2018

आर्थिक चर्चा :- बढ़ते बाजार में घटती प्रतिस्पर्धा ,अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती।



देश की चौथी सबसे बड़ी रिटेल तथा सुपरमार्केट चेन आदित्य बिरला समूह रिटेल ने बीते 20 सितंबर को कंपनी की 49 फ़ीसदी हिस्सेदारी अमेरिकी कंपनी अमेजॉन को बेच दी। अप्रत्यक्ष रूप से हुई इस डील में अमेरिकी कंपनी अमेजॉन, समारा समूह की तरफ से पैसा लगाएगी।
    
                     पिछले वित्तीय वर्ष में भारतीय बाजार में 1000 से भी अधिक कंपनियों का विलय अथवा अधिग्रहण हुआ। एक्सिस बैंक- फ्रीचार्ज, फ्लिपकार्ट -ईबे, एयरटेल- टेलीनॉर , टेक महिंद्रा -सीटीएस सॉल्यूशंस, जैसे कई उदाहरण हर क्षेत्र में व्याप्त हैं जो विलय तथा अधिग्रहण की कहानी बताने को काफी हैं। 
    
                पर आखिर वो क्या कारण हैं, जो अकेले दम पर खड़ी हुई इन कंपनियों को एक बेहतर बाजार होने के बावजूद अपने अस्तित्व के लिए विलय या अधिग्रहण का सहारा लेना पड़ रहा है। 

रुपये की खस्ता हालत, जीएसटी तथा नोटबंदी के तय लक्ष्य को हासिल न कर पाना, npa में अप्रत्याशित वृद्धी, तथा कंपनियों का बढ़ता घाटा जैसी कई ऐसी समस्याएं हैं जो आने वाले समय में भारत की आर्थिक स्थिति पर काले बादल लगा सकती है।

          विश्व के दूसरे सबसे बड़े बाजार में जब कंपनियां आती या जाती हैं तो यह कोई बड़ा विषय नहीं होता । अमूमन लोगों को लगता है कि सरकार तथा बाजार दोनों अलग-अलग चीजें हैं जिनका विलय नहीं हो सकता । सरकार एक प्रशासनिक संस्था है और बाजार एक आर्थिक संस्था। पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है। बाजार में होने वाली तमाम गतिविधियों पर सरकार की पैनी नजर होती है तथा सरकार के हर फैसले से बाजार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर अवश्य ही पड़ता है। सरकार भी बाजार पर नियंत्रण का हर संभव प्रयास करती है। इन प्रयासों में सबसे अधिक भूमिका सरकार द्वारा निर्मित उन संस्थाओं या प्राधिकरणों की होती है जिनका निर्माण अलग-अलग व्यापारिक क्षेत्रों में संतुलन या पर्यवेक्षण के लिए सरकार करती है। उदाहरण के तौर पर SEBI, TRAI, फॉरेन ट्रेड डिवीजन इत्यादि ऐसी कई संस्थाएं हैं जिनका निर्माण बाजार में प्रतिस्पर्धा तथा राजस्व बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा किया गया है।

               पर अगर जमीनी हकीकत की बात करें तथा व्यापारिक वर्ष 2017-18 को ही आधार माने, तो इस वर्ष
17 लाख पंजीकृत कंपनियों में अगर प्रतिस्पर्धा के आंकड़े देखें तो काफी आश्चर्यजनक और निराशापूर्ण नजर आते हैं।

 कार, कंप्यूटर ,फार्मास्यूटिकल तथा मोबाइल ही वो क्षेत्र बचे हैं जहां 4 या उससे अधिक कंपनियों में प्रतिस्पर्धा है।

 बाकी म्युचुअल फंड, टेलीकॉम, पैट्रोलियम,E-कॉमर्स, विमान सेवाएं, स्टील,दुपहिया वाहन, प्लास्टिक रॉ मैटेरियल , एल्युमीनियम, ट्रक और बसें , कार्गो , रेलवे, कोयला ,सड़क परिवहन ,तेल उत्पाद, बिजली वितरण, इत्यादि ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें मुनाफा तो बहुत है पर प्रतिस्पर्धा के नाम पर इनमें एक से तीन कंपनियां ही सक्रिय है।

 कुछ तो ऐसे क्षेत्र भी हैं जिनमें एक ही कंपनी का एकछत्र राज है या व्यापारिक भाषा में कहें तो बाजार का एकाधिकार है।


 घटती प्रतिस्पर्धा की मार ने वर्ष 2017 में 2 लाख 24 हजार कंपनियों को बंद होने के लिए विवश कर दिया। पर क्या यह भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य के लिए अच्छे संकेत हैं?

 टेलीकॉम क्षेत्र में बीएसएनल के घटते तथा रिलायंस समूह के जिओ के बढ़ते वर्चस्व को देखकर अब लगने लगा है कि बाकी कंपनियां केवल अपने अस्तित्व की चिंता में ही लगी है, मुनाफा तो दूर की बात है। 

सेबी के चेयरमैन ने भी इससे पहले म्यूचुअल फंड क्षेत्र की हकीकत बताई और कहा कि क्षेत्र के 60 से 70% हिस्सेदारी तीन से चार कंपनियों के पास ही है। इस क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की आवश्यकता है।

 पर अगर सरकार के पक्ष को देखें तो हकीकत इससे काफी अलग है। पिछले महीने ही फ्रांस के पूर्वराष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के राफेल पर दिए गए वक्तव्य ने भी सरकार की किरकिरी कराई। हिंदुस्तानी कंपनी HAL, जो कि भारतीय रक्षा मंत्रालय का ही एक उपक्रम है ,राफेल डील में उसे ना चुनकर एक नवनिर्मित कंपनी को सरकार द्वारा तरहीज देना भी सरकार पर उंगली उठाता है।

 सरकार , उसके तमाम उपक्रम एवं प्राधिकरणों को बाजार में घट रही प्रतिस्पर्धा के विषय में नए प्रारूप से विचार करने की आवश्यकता है। वह भी उस वक्त जब ज्यादातर अधिग्रहण अथवा विलय में विदेशी कंपनियों का ही हस्तक्षेप है। भारतीय बाजार में विदेशी मुद्रा का सामान्य से अधिक निवेश भी भारतीय मुद्रा के गिरने का एक मुख्य कारण है।आयात-निर्यात  अनुपात का असमान होना, 8 से 10 भारतीय कंपनियों का हीं बाजार पर स्वामित्व तथा सरकार का व्यापारियों की गोद में बैठना वो प्रमुख कारक है जो भारतीय अर्थव्यवस्था को भविष्य में एक गहरी खाई में धकेल सकते हैं।

Gunjan की कलम से।

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