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Monday, October 8, 2018

बेसहारा बच्चे-रोजमर्रा की जिन्दगी से जंग लड़ते हुए


नगरों और महानगरों की सड़कों पर बेसहारा व अनाथ बच्चों को देखते हैं, जो इधर-उधर भीख मांग रहे होते हैं। कहीं किसी राह चलते के पैर पकड़ कर उनसे भीख मांगने लगते हैं तो कहीं ट्रैफिक लाइट पर रुकी हुई कारों के शीशे खटखटाने लगते हैं।उनमें से अगर किसी का दिल पसीज जाता है तो उनको दो चार रुपये दे देते हैं और फिर वहां से निश्चिंत हो जाते हैं कि हमने एक गरीब बच्चे को दान दे दिया। लेकिन वास्तव में कोई यह नहीं सोचता कि वह बच्चे कौन हैं इनका क्या अतीत और कैसा भविष्य है।
ये बड़े शहरों व मेट्रो सिटी के ज्यादातर बच्चे होते हैं। इनमें से अधिकांश का अपना कोई घर या ठिकाना नहीं होता है। उनका जीवन ओवरब्रिज,शेल्टर हाउस,व शहरों में खुले हुए अनाथ आश्रमों में बीतता है।आंकड़े बताते हैं कि देश में ऐसे बच्चों की संख्या 10 लाख से ऊपर है।
बालश्रम शुभशिक्षा के ज्वाइंट सेक्रेटरी राजीव बत्रा का कहना है कि ,अधिकांश बच्चे अपने आप घर से भागे हुए होते हैं क्योंकि जब वह अपने ही घर में विशेषकर अपने पिता की स्थिति देखते हैं जो नशे में चूर रहता है और घर पर लड़ाई झगड़ा करता रहता है। जिसके कारण बच्चे अपने इस जीवन से परेशान होकर बेहतर जीवन की तलाश में अपना घर परिवार छोड़ देते हैं।
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इन नाबालिग किशोरों का अपना परिवार ना होने के कारण इनकी परवरिश दोषपूर्ण होती है।सामाजिक ज्ञान शून्य होने के कारण यह अपने अच्छे और बुरे में फर्क नहीं कर पाते हैं,इसके कारण समाज में यह देखने को मिलता है कि,यह बच्चे अनेक जघन्य अपराधों में शामिल हो जाते हैं।शातिर अपराधी ऐसे ही बच्चों को अपनी शरण में लेकर पहले उनको नशेड़ी बनाते हैं फिर उनसे नशीले पदार्थों की तस्करी व अन्य अपराध करवाते हैं।एक सर्वे से पता चला है कि बाल अपराध में लिप्त बच्चों में से लगभग 67 फीसदी बच्चे 16 से 18 वर्ष की आयु के बीच के हैं। पिछले वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष किशोर अपराधियों की संख्या में 28 फीसदी का इजाफा हुआ है।खास बात यह है कि इसमें लड़कियों की अच्छी खासी संख्या है।
सोशल काउंसलर इन हापर की “रेस्कयूयिंग रेलवे चिल्ड्रन -रियूनाइटिंग फैमिलीज फ्रॉम इंडियन रेलवे प्लेटफॉर्म” पुस्तक बताती है कि घर से भाग जाने वाले बच्चों का मामला वैश्विक है।इस पुस्तक के मुताबिक भारत के 50 मुख्य रेलवे स्टेशनों के प्लेटफार्म पर हर साल 70000 से 120000 बच्चे पहुंचते हैं।
हम अगर दिल्ली की बात करें तो यहां पर बेसहारा बच्चों की संख्या 50 हजार के लगभग है।जिसमें 20 फीसदी के आसपास लड़कियां हैं।इसमें से 50 फीसदी अनपढ़ है। 20 फीसदी कूड़ा बीनकर व 15% फीसदी भीख मांगकर गुजारा करते हैं।शेष बच्चे कहीं ढाबों पर या किसी दुकान पर दिन भर काम करके अपना जीवन बिताते हैं।इनमें एक चौथाई लड़के और लड़कियां यौन शोषण का शिकार भी पाई गई है। हकीकत यह है कि इन बच्चों की कोई देखभाल करने वाला नहीं है।
कभी-कभी हम देखते हैं कि अगर बेसहारा बच्चों पर आसपास किसी नेता या किसी एनजीओ की नजर इन बच्चों पर पड़ जाती है तो इनको एक बार के लिए तो खाना व कपड़ा मुहैया करा देते हैं,लेकिन फिर उसके बाद उन बच्चों का जीवन वैसा का वैसा ही रह जाता है। जिस वक्त इन बच्चों को मां बाप के प्यार व दुलार की जरूरत होती है उस वक्त यह सड़कों पर भीख मांग रहे होते हैं,जिसके प्रभाव से बच्चों में मनमाना व्यवहार करने की भावनाएं पैदा हो जाती है।
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हमारे देश में बेसहारा बच्चों को समाज एक भार के स्वरूप में देखता है,जिससे यह पता चलता है कि हमारे देश में सामाजिक चेतना का अभाव है।सरकारों के साथ-साथ समाज का भी दायित्व बनता है कि वह इन बच्चों की देखभाल करने में सहयोग करे,इनके लिए बाल संरक्षण गृहों का एक रचनात्मक ढांचा विकसित किया जाए तथा इन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए एक उचित व्यवस्था की जाए।
बेसहारा बच्चों की सहायता को लेकर भारत सरकार द्वारा महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा फास्टर योजना(पालन-पोषण देखरेख योजना)का शुभारंभ किया गया है। इसके अंतर्गत बेसहारा बच्चों को उनके बैंक खातों में ₹2000 प्रतिमाह उपलब्ध कराए जाएंगे। लेकिन सरकारी अनियमितता व भ्रष्टाचार के कारणों से यह धनराशि नहीं पहुंच पा रही है। ऐसे में क्या हम कह सकते हैं कि हम बेसहारा बच्चों को लेकर संवेदनशील है?

भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली से
अम्बरीष वर्मा की रिपोर्ट।

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