साल 2018 का ग्लोबल हंगर इंडेक्स (Global Hunger Index) जारी हो गया है और इस बार भारत की रैंकिंग और गिरी है। भारत को 119 देशों की सूची में 103वां स्थान मिला है। मतलब भूखमरी दूर करने की भारत की कोशिशों को तगड़ा झटका लगा है। एक तरफ तो हम मंगल पर बसने का विचार कर रहे हैं, खुद को अमीर देश और विकसित देश दिखने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह एक कड़वा सच है कि भारत की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी भूखा सोती है। ऐसा नहीं है कि भारत में अनाज की कमी है या पैदावार कम है बल्कि अनाज जरूरतमंदों तक पहुंच ही नहीं पाता हैं।
इसी साल खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसके अनुसार भारतीय प्रतिदिन 244 करोड़ रुपए का भोजन बर्बाद कर देते हैं जो लगभग 89060 करोड़ रुपए वार्षिक बैठता है। दूसरी ओर भारत में प्रतिदिन लगभग 20 करोड़ लोग भूखे सोते हैं। यह आंकड़ा चीन में भुखमरी के शिकार लोगों से कहीं अधिक है।
कुल उत्पादित खाद्य सामग्री का 40 प्रतिशत भाग भारत में प्रतिवर्ष नष्ट हो जाता है। भारत में अनुमानत: प्रतिवर्ष 23 करोड़ टन दालों, 12 करोड़ टन फलों और लगभग 21 करोड़ टन सब्जियों के नुक्सान के अलावा पार्टियों और अन्य सामाजिक आयोजनों में 15-20 प्रतिशत भोजन बर्बाद होता है। उल्लेखनीय है कि 2016 में भी एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि ब्रिटेन के लोग जितना खाना खाते हैं उतना भारतीय नष्ट कर देते हैं, लेकिन फिर भी हर 7वां भारतीय भूखा सोता हैं।
भारतीय संस्कृति में अन्न को देवता का दर्जा प्राप्त है और यही कारण है कि भोजन झूठा छोड़ना या उसका अनादर करना पाप माना जाता है। मगर आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपना यह संस्कार भूल गए हैं। यही कारण है कि होटल-रेस्त्रां के साथ ही शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में सैकड़ों टन खाना रोज बर्बाद हो रहा है। भारत ही नहीं, समूची दुनिया का यही हाल है। एक तरफ अरबों लोग दाने-दाने को मोहताज हैं, कुपोषण के शिकार हैं, वहीं रोज लाखों टन खाना बर्बाद किया जा रहा है।
भूख से मौत या पलायन, वह भी उस देश में जहां खाद्य और पोषण सुरक्षा की कई योजनाएं अरबों रुपये के अनुदान पर चल रही हैं। जहां मध्याह्न भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चों को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो। जहां हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो। वैसे भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र ने जारी किए हैं। देश के 51.14 प्रतिशत परिवारों की आय का जरिया महज अस्थाई मजदूरी है। 4.08 लाख परिवार कूड़ा बीन कर, तो 6.68 लाख परिवार भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं। गांव में रहने वाले 39.39 प्रतिशत परिवारों की औसत मासिक आय दस हजार रुपये से भी कम है।
इस मामले में सिर्फ सरकार को दोष देकर पल्ला झाड़ लेने से काम नही चलेगा। खुद जागरूक होकर एवं दूसरों को जागरूक कर हम इस समस्या का बहुत हद तक समाधान निकाल सकते हैं। बाकी सरकार व नेताओं को सिर्फ इसलिए नही चुना जाता की वह अपनी चुनावी रैलियों में अपने खोखले विकास का ढिंढोरा पीटते रहे। इतने बड़े देश में अचानक से हालातों का सुधर जाना बहुत मुश्किल हैं। लेकिन जनता, सरकार और मशीनरी इस भारी-भरकम समस्या को लेकर अगर प्रतिबद्ध हो जाए तो वह दिन दूर नही, जब ग्लोबल हंगर इंडेक्स की सूची में भारत का क्रमांक विचलित करने वाला नही गर्व करने वाला हो। फिलहाल तो यह एक स्वप्न जैसा ही हैं।





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