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Monday, November 26, 2018

बनारस टॉकीज़ : यह किताब नहीं, चलती फिरती ज़िंदगी यानी बनारस है।


सत्य व्यास द्वारा लिखी "बनारस टॉकीज" किताब कॉलेज के दिनों की यादों को तरोताजा करती है। दोस्तों के बीच की मस्ती,किस्सा-गोई,गाली-गलौज तफ़री, लड़कियों पर होती घंटों चर्चा, होस्टल की बेहतरीन और आनंदमई दुनिया को सत्य व्यास ने बड़ी ही सरलता और आम-बोलचाल की भाषा में पाठकों को प्रस्तुत की है।

इस किताब को लिखने के लिए मैं सत्य व्यास को बहुत बधाई देता हूं। जिस प्रकार उन्होंने लाखों युवाओं के कॉलेज के दिनों को साहित्यिक रूप देकर एक किताब के रूप में संजोया है, वह अप्रतीम है।

   इस किताब को पढ़ने के बाद सोचा कि इसकी समीक्षा लिखूं और जब सोच लिया तो बस लिख ही दिया।

यह किताब बीएचयू के बीडी(भगवानदास) होस्टल में रहने वाले छात्रों की कहानी है जो लॉ करने के लिए बनारस आए हैं। तीन साल के कोर्स के 6 सेमेस्टर के दौरान की छोटी-बड़ी घटनाओं को यह किताब समाहित करती है।

 पूरी कहानी के तीन मुख्य पात्र है। पहला, जिसके इर्द-गिर्द ही पूरी कहानी चलती है, जिसका नाम है सूरज। प्यार से सब उसको 'बाबा' बुलाते हैं। दूसरा, अनुराग डे  जिसको सूरज 'दादा' कहकर पुकारता है। तीसरा,जयवर्धन शर्मा। और भी अनेक पात्र है इस कहानी के जैसे- नवेन्दु जी, रोशन चौधरी, विनीत,मुरली सर, दुबे जी( जिन्हें सब 'अल-दुबेरा' कहते है)।

  लेखक ने कई हिस्सों में तीन साल के होस्टल लाइफ को बांटा है।

    पहले हिस्से में लेखक ने हॉस्टल में नए छात्रों के आगाज यानी कि शुरुआती दिनों के बारे में लिखा है। भले ही कैंपस एंटी-रैगिंग जॉन हो, लेकिन सीनियर्स का अधिकार होता है रैगिंग लेना और जूनियर्स का काम होता है रैगिंग देना। रैगिंग के दौरान कराए गए कामों के बारे में जब आप किताब में पढ़ेंगे तो आप अपनी हंसी रोक नहीं पाएंगे। बाबा और दादा का गर्ल्स हॉस्टल का दौरा आपको आगे पढ़ने के लिए बेचैन करेगा।

 लेखक ने देहाती भाषा यानी कि बनारसी टोन को खूब इस्तेमाल किया है। अंग्रेजी का भी बहुत जगह प्रयोग किया गया है। जयवर्धन शर्मा द्वारा कही जाने वाली देहाती कहावतें कहानी को दिलचस्प और मनोरंजक बनाती है।
  
दूसरे हिस्से में लेखक बाबा का एक लड़की के प्रति प्रेम व्यवहार को बड़ी ही रोमांचक तरीके से बताता है। दोस्तों के बीच की गाली गलौज आपको लगातार कहानी में मिलती रहेगी। बाबा लगातार शिखा को एहसास दिलाता रहता है कि वह उससे प्रेम करता है और बाबा उसके साथ समय बिताने का एक भी लम्हा छोड़ना नहीं चाहता। शिखा भी उसके साथ समय बिताने लगती है। दोनों के प्रेम कहानी को काफी बेहतरीन तरीके से पेश किया गया है।

 तीसरे हिस्से में भी लेखक पाठकों को बांधे रखता है। परीक्षा की तैयारी ठीक से ना होने से बाबा और उसके दोस्त टेंशन में रहते हैं। बाबा, पेपर लीक करने की योजना बनाता है और अपने दोस्तों के साथ मिलकर इस घटना को अंजाम देता है ।

चौथे हिस्से में लेखक ने कहानी को संवेदनशील बना दिया है।लेखक ने समाज की बुराई की ओर इंगित करने का काम किया है और दादा यानी कि अनुराग डे के नेतृत्व में  पूरा होस्टल रेडलाइट एरिया से लड़कियों को बाहर निकालने की योजना बनाता है।
पांचवें हिस्से में लेखक पाठकों को कहानी में बांधने में नाकाम दिखता है लेकिन अगले हिस्से में इस कमी की पूर्ति कर ली जाती है।

 छठे हिस्से में लेखक ने जयवर्धन की सीनियर्स को दिए क्रिकेट की चुनौती का जिक्र किया है। लेकिन अनुराग ने इसे जूनियर्स के आत्मसम्मान पर लेकर क्रिकेट मैच की पूरी योजना बनाने के काम में लग जाता है। क्रिकेट मैच के दौरान बाबा और दुबे जी के बीच संवाद आपको खूब हसाएंगे और जयवर्द्धन शर्मा की बकैती आपको कहानी में बनाए रखेगी।

 सातवें हिस्से में लेखक ने फिर कहानी को संवेदनशील बनाया है। इस हिस्से को पढ़कर मैं खुद रुहासा सा हो गया था और मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे।

   आठवें हिस्से में लेखक होस्टल के ही एक छात्र रोशन चौधरी द्वारा रची साजिश का जिक्र करता है। लेखक ने बड़ी ही खूबसूरती से पूरी कहानी को इस साजिश से जोड़ा है और ऐसा लगने लगता है कि पूरी कहानी इस साजिश के लिए ही लिखी गई हो।

  नौंवे और अंतिम हिस्से में भी लेखक ने कहानी को दिलचस्प बनाये रखा है।

  लेखक ने कहानी का अंत बेहतरीन किया है। खुशखबरी सुनने के बाद बाबा, दादा से बाइक की चाभी मांगता है और प्रेजेंटेशन देने के लिए कॉलेज निकल जाता है। जाते-जाते बाबा बस यही सुन पाया जो जयवर्धन शिखा से पूछ रहा था:
     " और फिर, तुम लोग शादी कब कर रहे हो?"
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भारतीय जन संचार संस्थान में प्रशिक्षु पत्रकार "कृष्ण मुरारी" द्वारा लिखित

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