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Sunday, December 2, 2018

वीकेंड की चिट्ठी: प्रिय पिंकिया के पापा।


प्रिय
पिंकिया के पापा ,
मैं कुशल हूँ ,आप भी कुशल होंगे ऐसा ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ। अब तो ख़त के शुरुआत में कुशल लिखना कुछ अटपटा सा लगता है। आप भी सोचते होंगे की शुरू में कुशलता की बात करके पुरे ख़त में अपना दुखड़ा रोती है। वो क्या है न...! मायका में आसरा माई - बाउजी ये ले और ससुरा में पतिए ले।
पिछले दो सालो से जब भी मन उचटता है आपके चिठ्ठियों से बाते कर लेती हूँ , उसमे आपका होना महसूस कर लेती हूँ। पिंकिया भी माई के ऊँगली से मेला घूम आती है। वो तो अब बाप के कंधे को भूल भी चुकी है। कितना याद कराऊँ..! बच्ची है ना सामने के देखी चीजो को ज्यादा समझती है।
इस बार का भी भादो तो तिरपाल के सहारे गुजर गया।अपने हिस्से का जो खेत बंटवारे में मिला था उसमे मैंने धान बो दिया था। आपके भेजे गए पुरे दो बार का पैसा मैंने उसी में लगा दिया। बहुत मेहनत भी किया था। धान के घने डंठल मेरे शरीर को भीतर से मजबूत बना रही थी। उसकी हरियाली झुर्री पड़ी मेरे चेहरे में एक नई जान भरती थी। लेकिन इस बार के बारिश में पूरा धन डूब गया । मैं बारिश की हर सुबह उसे और डूबते हुए देखते जा रही थी और कुछ नहीं कर पा रही थी। जैसे एक भूखा बच्चा अपने माँ से खाना मांग रहा हो और माँ लाचार खड़ी हो। देखते - देखते पूरा धान का फसल सड़- गल गया है। सोची थी की इस बार के चावल से ही हम दोनों माई - बेटी पूरा साल काट देंगे तो आपको घर बनाने के लिए पैसा बचाने में थोडा उबार मिल जाएगा।
फिलहाल , घर में आनाज के नाम पर कुछ दिनों के लिए पिछले बार वाला गेंहूँ बचा है। यह ख़त मिलते ही पैसा लगा दीजियेगा। सर्दी भी आने वाली है पिंकी के लिए एकाद स्वेटर भी खरीद दूंगी। और हो सके तो अब कुछ दिन के लिए आ जाइये ।
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हमेशा से आपकी,
पिंकिया की माई।

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