नरेंद्र मोदी को सत्ता में आए 5 साल पूरे होने वाले हैं। 2014 के चुनावों पर अगर हम नज़र डाले तो हमें एक ही चेहरा नज़र आता है-वो है मोदी का। कांग्रेस के 10 सालों के शासन से ग्रस्त होकर देश की जनता ने एक ऐसे नेता पर भरोसा किया जो देश को वैकल्पिक सोच दिखाकर उनके जीवन में आमूलचूल बदलाव का सपना बेच रहा था। दूसरा कोई विकल्प न होने के कारण जनता ने मोदी नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनवा दी।
इस जीत को भ्रष्टाचार बनाम विकास के अलावा दूसरे रुप में भी देखा जा सकता है। यह भाजपा के कार्यकर्ताओं और उनके लंबे संघर्षों की जीत थी।
इन सब के बरक्स सवाल कई हैं। पहला, जिन जन-इच्छाओं के आसरे मोदी सत्ता में आए, क्या वे उसे पूरा कर पाए। दूसरा, क्या मोदी ये मान बैठे है कि कारपोरेट की पूंजी तले ही सत्ता चलती रहेगी और सत्ता की हर पहल ही चाहे वो किसान विरोधी ही क्यों न हो,लोकतंत्र को मज़बूत करती रहेगी। तीसरा, तीन राज्यों में सत्ता गवांने के बाद भी क्या भाजपा ये समझ नहीं पाई है कि मोदी सत्ता की नीतियों का विरोध कर जहां एक तरफ कांग्रेस राज्य दर राज्य विजय हो रही है, वहीं दूसरी तरफ, कांग्रेस सरकार द्वारा लाई गई उदारीकरण की नीति के बरक्स अब वो ही किसानी अर्थव्यवस्था पर जोर देकर अपनी स्तिथि फिर से मज़बूत कर रही हैं।
तो रास्ता जाता किस ओर है। मोदी देश के सामने लगातार एक लकीर खींचना चाह रहे है जिसके पार उनकी अपनी ही पार्टी के कद्दावर नेता चाहे वो राजनाथ सिंह हो,शिवराज सिंह हो या रमण सिंह हो, कोई उस लकीर तक आ नहीं सकता। और ये लकीर मिट न जाए इसके लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी मैनेजमेंट के आसरे लगातार कोशिश करते नज़र आ रहे हैं।
तो फिर सवाल कई हैं। पहला, क्या मैनेजमेंट के आसरे ही मौजूदा वक़्त में चुनाव जीते जा सकते हैं? दूसरा, तीन राज्यों में हार से कार्यकर्ताओं का जो मनोबल टूटा है, उसे अमित शाह कैसे फिर से ऊर्जावान बनाएंगे? तीसरा, कॉरपोरेट के बरक्स किसानों को क्या अगले तीन महीनों में साधने की कोशिश की जाएगी।
हमेशा से माना जाता रहा है कि भाजपा के पीछे संघ का कैडर है जो उसे हर घर तक मजबूत करने की कोशिशों में लगा रहता है। लेकिन जब बात रोटी की हो, महँगाई की हो, तब चाहे संघ का स्वयंसेवक ही क्यों न हो, वो सरकार की खिंचाई करने से चूकता नहीं हैं। और जिस तरह इन चार सालों में मोदी ' लार्जर देन लाइफ ' की इमेज बनाते चले गए और खुद को ही पार्टी से ऊपर मान बैठे, तो इससे कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों में एक संदेश गया है कि उन्होंने जो मेहनत करके मोदी को जितवाया अब वही नेता उनसे दूर होते चले जा रहे हैं।
तो ऐसे में क्या अमित शाह की बूथ मैनेजमेंट, सूक्ष्म राजनीति और सोशल इंजीनियरिंग अपना चमत्कार दिखा सकती हैं या मोदी एक नया सपना लोगों को दिखाकर 2019 के किले को फतह कर पाएंगे? ऐसे में फिर सवाल यहीं उठता है कि क्या सत्ता के बोल ही संविधान है और सत्ता की हर पहल ही लोकतंत्र है?
- - - - - - - - - - - - - - - -
भारतीय जन संचार संस्थान , नई दिल्ली से कृष्ण मुरारी का लेख।

No comments:
Post a Comment
आपको यह कैसा लगा? अपनी टिप्पणी या सुझाव अवश्य दीजिए।