पुलवामा हमले के 24 घंटे के भीतर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पुरानी क्लिप और मारे गए आतंकी के साथ राहुल गांधी की तस्वीरें इंटरनेट पर तेजी से फैलने लगी। देश की दोनों ही बड़ी पार्टियां जानती हैं कि सेना और कश्मीर आम भारतीय की नाजुक नब्ज़ है जिस पर हाथ रख कर आसानी से वोट पाया जा सकता है। पर इतनी बड़ी घटना के बाद राजनीति में बदला ही क्या। प्रधानमंत्री ने रुद्रपुर में रैली की ही, अमित शाह ने कर्नाटक में कार्यकर्ताओं को संबोधित किया ही, मनोज तिवारी ने प्रयागराज में कंसर्ट किया ही, राहुल गांधी और कांग्रेस वापस चुनावी रैली में व्यस्त है। तो आखिर कश्मीर की आग को इतनी हवा मिल कहाँ से रही है।
दरअसल कश्मीर शतरंज की वह बिसात है जिसमें हर किसी को लगता है कि राजा, वजीर या हाथी सबसे ताकतवर है। पर वो ये भूल जाते हैं कि राजा, वजीर और हाथी हैं तो महज मोहरे ही। वो देखते ही नहीं कि इस बिसात पर काले और सफेद मोहरों से खेलते खिलाड़ी कौन है। इन मोहरों को चला कौन रहा है।
भारत और पाकिस्तान में जब तक कश्मीर के मुद्दे पर सरकारें बनती और गिरती रहेंगी तब तक इस मुद्दे को सरकारें सुलझाएंगी नहीं।
एक लंबे अरसे से कश्मीरियों में भारतीय शासन से असंतुष्टि देखी जाती रही है ,जिसका उदाहरण समय-समय पर चुनावों में पड़े मत प्रतिशत से दिखता है।
पर्वतीय क्षेत्र कश्मीर पिछले 70 वर्षों से भी अधिक समय से भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का मुख्य विषय रहा है।
•अगस्त 1947 में भारत और पाकिस्तान दोनों को ही ब्रिटन से आज़ादी मिलने के पहले ही कश्मीर का इलाका विवाद का विषय रहा है।
•इस विवाद पर भारत पाकिस्तान के बीच अब तक तीन युद्ध हो हुके हैं
•1989 से आज़ाद कश्मीर को लेकर अलगाववादी आंदोलन की शुरुआत हुई
•भारत पाकिस्तान दोनों आज़ाद कश्मीर के विकल्प को नहीं मानते
1947 के भारत स्वतंत्रता कानून में ये प्रावधान था कि कश्मीर भारत या फिर पाकिस्तान में मिलने के लिए स्वतंत्र है। कश्मीर के महाराजा हरि सिंह आज़ाद रहना चाहते थे। लेकिन बाद में पाकिस्तानी हमले के बाद उन्होंने भारत में मिलने का फ़ैसला कर लिया।
सैनिक सहायता और प्रस्तावित जनमत संग्रह के वायदे पर उन्होंने भारत सरकार को सभी प्रमुख शक्तियां सौंप दीं। उसके बाद से ही ये इलाका भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का विषय एवं युद्ध क्षेत्र बना हुआ है।
कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के परस्पर विरोधी दावों के अलावा 1989 से वहां एक अलग अलगाववादी हिंसक आंदोलन शुरु हो गया। जिसे सैयद सलाउद्दीन को विधानसभा चुनाव में जबरन हराये जाने का नतीजा बताया जाता है। चुनाव में भारत सरकार के नाजायज दखल के खिलाफ उसने बंदूक उठाई और हिज़बुल मुजाहिद्दीन का गठन किया। ये लोग आज़ाद कश्मीर की मांग करते हैं। जिसे पाकिस्तान प्रेरित भी कहा जाता है।
पर जिस तरह से वर्तमान में कश्मीरियों के खिलाफ देश में आतंक का माहौल है, देश के अलग अलग हिस्से से उन्हें भगाया जा रहा है ,इस स्थिति में क्या मुख्य धारा में आये कश्मीरी भारत को अपना देश मानेंगे? सवाल अब भी कायम हैं कि 4 लाख से अधिक सैनिकों की तैनाती और सीमा की मजबूत घेराबंदी के बावजूद आतंक देश मे कैसे प्रवेश कर रहा है? अलगाववादियों को किससे खतरा है जो उन्हें अबतक सुरक्षा दी जा रही थी? नीति निर्धारण करने वाली सत्ता से सवाल पूछने पर उन्हें पाकिस्तान परस्त क्यों कहा जा रहा है? क्या हमें सिर्फ कश्मीर चाहिए या कश्मीरी भी? अगर सिर्फ कश्मीर चाहिए, तो हम साम्राज्यवादी चीन से अलग कैसे हुए?
कौशलेंद्र यादव
(हिंदी पत्रकारिता)


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