आजादी के बाद से वक्त दर वक्त हमारा देश भारत एक नया कीर्तिमान हासिल करता गया। ऐसा ही किया हमने शिक्षा के क्षेत्र में। सन 1947 में भारत में जहां 12 प्रतिशत लोग शिक्षित थें, तो यही आंकड़ा 2011 की जनगणना में बढ़कर 74.04 प्रतिशत हो गया। शिक्षा से हममें विनय आता है। हम तार्किक,उदार और सहिष्णु बनते हैं ।
किंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसा नहीं लगता है। हम आक्रोश और घृणा के बीच के अंतर को पाटने में लगातार असफल हो रहे हैं। हम भूलते जा रहे हैं कि घृणा का अगला रूप होता है हिंसा।
पिछले दिनों पुलवामा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 42 जवान एक फिदायीन हमले में शहीद हो गए। इस घटना की जितनी निंदा की जाए वह कम है। इस मुद्दे पर युवा राष्ट्र का आक्रोशित होना भी स्वाभाविक है। यह आक्रोश किसी एक देश के विरुद्ध होना भी लाजमी है,अगर वह आतंक के आकाओं का शरणस्थली बना है। लेकिन चिंता और प्रश्न तब उठता है,जब हम अपनों में ही देशप्रेमी और देशद्रोही ढूंढने लगते हैं। किसी के द्वारा प्रकट किए विचार को सुनना नहीं चाहते हैं, समझना नहीं चाहते हैं। वास्तविकता में ऐसा करके हम उसी विचारधारा का समर्थन कर रहे होते हैं,जिस विचारधारा का हम विरोध कर रहे होते हैं।
शहीद हुए जवानों के लिए श्रद्धांजलि देने का दौर शुरू हुआ। राष्ट्रीय मीडिया से लेकर क्षेत्रीय मीडिया तक में इनके लिए तरह-तरह की मांगे रखी गई। लेकिन शहीदों की चिता की आग बुझने से पहले यह मांगे ठंडे बस्ते में डाल दिए जाएंगे। इस समय जिम्मेदार व्यक्ति और संस्था से जो बुनियादी प्रश्न हमें पूछना चाहिए था,हम उससे मुंह फेर रहे हैं। जो पूछने का साहस दिखा रहे हैं,उन्हें देशद्रोही का तमगा दे रहे हैं।
आत्मघाती हमले को अंजाम आदिल अहमद डार ने दिया। आदिल भी पुलवामा के काकापोरा का ही रहने वाला था। जिस मानसिकता का परिचय आदिल ने दिया,वह बताता है कि वो अपनी तर्क क्षमता और मानवता के सारे गुणों को खो चुका था और किसी के हाथों की कठपुतली बन कर आ गया था। ऐसी मानसिकता किसी भी राष्ट्र के लिए खतरनाक है।
ऐसे में 2 बुनियादी प्रश्न मन में उठता है। पहला यह कि इंटेलिजेंस अलर्ट के बाद हमले को अंजाम कैसे दिया गया ? दूसरा यह कि कश्मीर में युवाओं की इस खतरनाक मानसिकता का क्या उपाय है ?
इन सबों से भी बड़ा प्रश्न यह है कि हम अपने भारतीय होने के गुण अर्थात श्रेष्ठ उदार और तार्किकता को क्यों खोते जा रहे हैं? जवानों पर हुए इस हमले के विरोध में अगर देश के किसी भी कोने में जम्मू-कश्मीर के निवासी या किसी एक मजहब के प्रति हिंसा को अंजाम दिया जाता है तो हम श्रद्धांजलि जवानों को नहीं दे रहे होंगे बल्कि अपने अंदर आदिल अहमद डार को चरितार्थ कर रहे होंगे।
भारतीय जन संचार संस्थान , नई दिल्ली से रिपुदमन का लेख।

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