महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार को लेकर देश में बात हो रही है। यह एक अच्छी पहल है। खासकर उस देश के लिए जहां हर वर्ष करीब 3.5 लाख मामले महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के संबंध में दर्ज किये जाते हैं। इन 3.5 लाख में करीब 94000 ऐसे मामले होते हैं जिनमें महिलाओं के साथ रेप या उनकी हत्या कर दी जाती है। 21वीं सदी में आकर अगर देश में रोज़ करीब 1400 महिलाओं के साथ रेप हो रहे हैं तो यह ज़रूरी है कि इसपर बात हो और बड़ी सख्ती से बात हो।
पर मुझे इस देश के बात करने के तरीके पर हमेशा से शक रहा है। क्योंकि देश के लोगों के लिए एक बार को सब जायज़ है या फिर सब नाजायज़ है।
घोटाला अगर अपनी पार्टी का आदमी कर रहा है तो घोटाला भी ठीक है। रेप अगर अपनी कौम या पार्टी या विचारधारा का व्यक्ति कर रहा है तो रेप जायज़ है। सत्ता का दुरुपयोग अगर अपनी पार्टी या विचारधारा का आदमी कर रहा है तो वो भी ठीक है। आप रत्ती भर भी नैतिक नहीं हैं इसलिए इस बार भी मुझे आपके रवैये पर शक हो रहा है।
हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर से रेप करने के बाद उसकी लाश को जला दिया गया। यह एक महिला के साथ होने वाले अपराधों का सबसे वीभत्स रूप है। यूं तो किसे वीभत्स कहें किसे नहीं इसका अधिकार महिलाओं के पास ही सुरक्षित होना चाहिए। एक महिला की अनुमति के बिना उसे छूना (फिर चाहे वो आपकी पत्नी ही क्यों न हो) खुद में वीभत्स है फिर भी सहुलियत के हिसाब से संवेदनशील होने वाले लोगों के लिए वीभत्स की परिभाषा तय होनी चाहिए।
चूंकि इस घटना का आरोपी एक मुसलमान भी है, शायद इसलिए लोग दोपहर से ही मैसेज या टैग कर इस मुद्दे पर लिखने के लिए मुझे बोल रहे हैं। ज़्यादातर मैसेजों में यही लिखा है कि अब वामपंथी, बुद्धिजीवी वर्ग कहां है, क्या मुस्लिम आरोपी होने के कारण बिल में घुस गए।
पहली बात कि मैं कोई उलेमा या मुस्लिम पक्षकार नहीं हूं, और न ही संबंधित सरकार का आदमी हूँ। हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही आरोपी मेरे लिए दरिंदे हैं। फिर भी आप मुझसे लिखने की उम्मीद कर रहे हैं तो एक पत्रकार होने के नाते इसे अपनी उपलब्धि मान रहा हूं। चलिए मैं नहीं कहूंगा कि जब बदायूं में लड़कियों से रेप कर उन्हें पेड़ से टांग दिया गया तब आप कहां थे या नालंदा, सहरसा ,मुज़फ्फरपुर, रांची या रोज़ाना दर्ज होने वाले हज़ारों केस के वक्त आप कहां थे। मैं कहता हूं कि चलिए इसी केस को राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाते हैं और सरकार से मांग करते हैं कि रेप के केस के लिए फास्टट्रैक कोर्ट बनाकर कठोरतम सज़ा का प्रावधान किया जाए। पर क्या आपमें हिम्मत है कि आप रेप के केस में अपनी राजनीतिक व वैचारिक खुन्नस की जगह उस पीड़ित महिला को प्राथमिकता देंगे। क्या आपके आंदोलन के केंद्र में एक कौम को बदनाम करने की जगह बिना जाति धर्म और वर्ग देखे महिलाओं के लिए एक सुरक्षित समाज की मांग होगी। अंतर्मन से पूछकर बताइये कि आपकी संवेदनशीलता उस पीड़ित महिला के लिए है या आपकी नफरत आरोपी की कौम के लिए।
बिहार झारखंड के लोग जिस तरह का गुस्सा तेलंगाना के लिए दिखा रहे हैं वह गुस्सा रांची में एक आदिवासी छात्रा के साथ मंगलवार को 12 लोगों द्वारा किए गए गैंगरेप को लेकर क्यों नहीं देखने को मिल रहा है। वह जगह तो ज्यादा करीब है।
और जाते-जाते निर्भया की मां की राय जान लीजिए कि स्थिति कितनी बदली है। वो कहती हैं, "यह सच्चाई है कि 2012 और आज 2019 में महिलाओं के साथ जो क्राइम हो रहा है, उसमें कोई फर्क नहीं पड़ा है। देख लीजिए कि 2012 की घटना है (निर्भया) आज सात साल हो गए, फिर भी उनको सजा नहीं हुई। लड़की के परिवार में जो भी है, सरकार सबसे पहले उनको सपॉर्ट करे। उन्हें सुरक्षा चाहिए या कोई और जरूरत है तो उन्हें सरकार तुरंत मुहैया कराए और मुजरिम पकड़े जाएं और जल्दी से जल्दी उनको सजा हो। ये नहीं कि सालों साल बीत जाए।
फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई हो और उन्हें फांसी की ही सजा हो।"
फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई हो और उन्हें फांसी की ही सजा हो।"
बस इसलिए मुझे आपके गुस्से पर भी शक हो रहा है।
-गुंजन गोस्वामी
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