एक बहुत ही फेमस आध्यात्मिक डायलॉग है जिसे हम अक्सर सुनते रहते हैं। और वो है-शरीर नश्वर है, आत्मा अमर। बिना आत्मा के इस शरीर का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। अब अगर हम कहें कि ऐसा केवल आध्यात्म में ही नहीं बल्की बॉलीवुड में भी होता है तो आपको कैसा लगेगा। आप आराम से सोचिए अगर सोचने का वक्त नहीं है तो आगे पढ़िए।
बस आपको इसे समझने के लिए फिल्म को शरीर मानना पड़ेगा और फिल्मों के डायलॉग्स को आत्मा। जी हां क्योंकि बिना डायलॉग्स के हमारी फिल्में ठीक उसी तरह से हैं जैसे बिना नमक के खाना, बिना चाशनी के जलेबी, और बिना जान के शरीर। और आज हम बात करेगें उस डायलॉग की जिसे बॉलीवुड के 100 साल के इतिहास में सबसे उम्दा और फेमस डायलॉग माना गया है।
बॉलीवुड के 100 साल के इतिहास में न जाने कितनी ही फिल्मों में कितने ही डायलॉग इस्तेमाल किए गए। हम सब भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जाने कितने ही फिल्मी डायलॉग बोलते ही रहते हैं। पर एक डायलॉग ऐसा भी है जो हम सब ने कभी न कभी एक ना एक बार तो बोला ही होगा। अगर आप सिनेमा देखते हैं या फिर नहीं भी देखते हैं तब भी। जब भी कोई सामने से कहता है कि मेरे पास गाड़ी है बंगला है दौलत है शोहरत है तुम्हारे पास क्या है? मुंह से तपाक से निकलता है-
"मेरे पास माँ है"
दीवार फिल्म का एक सीन
यह हिंदी फिल्मों का सबसे कालजयी डायलॉग है। अब आप इसकी पॉपुलैरिटी का अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए कि ए.आर. रहमान ने ऑस्कर उठाने के बाद सबसे पहले इसी डायलॉग को बोला था। आज इस सबसे फेमस डायलॉग की बात इसलिए क्योंकि आज उस अभिनेता का जन्मदिन है, जो अगर ना होता तो शायद यह डायलॉग भी नहीं होता। अगर "मेरे पास माँ है" एक आत्मा है तो शशि कपूर वह शरीर हैं, जिसे इस आत्मा ने धारण किया था। क्योंकि बिना शरीर के आत्मा भी हवा का एक झोंका ही बन कर रह जाती है।
और इस आत्मा को धारण करने वाला शरीर पैदा हुआ था 18 मार्च 1938 को, और वो भी भारतीय सिनेमा के सबसे नामचीन पृथ्वी राज कपूर के खानदान में। पृथ्वी राज कपूर, राज कपूर और शम्मी कपूर जैसे दो कोहिनूर पहले ही सिनेमा जगत की झोली में डाल चुके थे। उसी कोहिनूर की तीसरी किश्त थे बलबीर राज कपूर यानि कि शशि कपूर।
फिल्मी खानदान से होने के बावजूद भी खूब संघर्ष किया और फिर मिली पहली फिल्म 'धर्मपुत्र'। और पहली ही फिल्म से अदाकारी की जो चमक बिखेरी, उससे तो खुद एक बार ध्रुव तारे को भी रश्क आ जाए। अपने करियर के चढ़ाव में शशि साहब के रोमांस का अंदाज इतना गजब का था कि मानो खुद कामदेव पर्दे पर उतर के अदाकारी बिखेर रहें हों।
और फिर उनके हिस्से आई वह फिल्म और डायलॉग जिसकी बात हमने इस आर्टिकल के शुरू में की थी। या फिर यूं भी कह लें कि उस फिल्म और डायलॉग ने खुद शशि कपूर को चुन लिया था, खुद को अनंत के अंत तक अमर बनाने के लिए।1975 में रिलीज हुई फिल्म 'दीवार'। यूं तो यह फिल्म अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग मैन के तौर पर स्थापित करने के लिए भी जानी जाती है। इस फिल्म के बाद भले ही अमिताभ की झोली में ज्यादा तारीफें गिरी हों।
पर महफिल लूटने और तालियां, सीटियां बटोरने वाला काम किया था शशि कपूर ने। वो शशि कपूर की आवाज का जादू था, या फिर उनकी अदाकारी का ठहराव पता नहीं। हां पर इतना पता है कि आज भी जब खाकी वर्दी पहने पर्दे पर एक पुलिस वाला सूट पहने हुए स्मगलर से कहता है कि "मेरे पास माँ है" तो बस निगाहें पर्दे से चिपक कर रह जातीं हैं।
जाते जाते शशि कपूर साहब की याद में बस इतना ही कि "इक रास्ता है जिंदगी, जो थम गए वो कुछ नहीं"
फिल्म जगत के इस नायाब कोहिनूर को कड़क मिजाजी की तरफ से जन्मदिन की श्रद्धांजलि....




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