अब मैं कैसे बताऊं
समझ नहीं आता
सदाए-हक या दुश्मनी निभाऊं
टूटने का डर भी तो बचा नहीं
मस्हूक का हस्र किसे दिखाऊं
कोई ख़्वाहिश नहीं बड़ा होने की
सदाए अर्श है कि जर्रा-जर्रा में समाऊं
मेरे गुलशन के अंजान माली
तेरी ख़लिश में कहीं
नागफनी न बन जाऊं
समझ नहीं आता
सदाए-हक या दुश्मनी निभाऊं।
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| संदीप कुमार वर्मा की कलम से |
ई मेल-yesandeep@gmail.com
कवि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।


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