और भी गम हैं बिहार में विशेष राज्य के झुनझुने के सिवा सुशासन बाबू - KADAK MIJAJI

KADAK MIJAJI

पढ़िए वो, जो आपके लिए है जरूरी

Breaking

Home Top Ad

Saturday, May 30, 2020

और भी गम हैं बिहार में विशेष राज्य के झुनझुने के सिवा सुशासन बाबू



बिहार के मुख्यमंत्री माननीय नीतीश कुमार को सुशासन बाबू के नाम से जाना जाता है। कारण यह बताया जाता है कि अपने कार्यकाल में इन्होंने बिहार का कायाकल्प कर दिया। 21वीं सदी की शुरुआत में ही बिहार की जनता ने अपना नेतृत्व श्रीमान के हाथों में दे दिया। श्रीमान ने 'सात निश्चय' के साथ 'बिहार के बहार' तक का दावामयी सफ़र पूर्ण किया है। अगर सब कुछ समान रहा तो फिर बिहार में चुनावी बिगुल बजना तय है हालांकि वर्तमान परिस्थिति इसकी अनुमति नही देती। 

चुनाव नही है तो मुद्दों के केंद्र में न किसान है न स्वास्थ है और न ही शिक्षा। राष्ट्र के संविधानेत्तर चतुर्थ स्तम्भ (पत्रकारिता) का भी अभी इन पर कोई मत नही है।शाही लिच्ची का विज्ञापन सरकार महामारी के दौर में भी कर रही है। पटना, भागलपुर जैसे शहरों में घर तक पहुंचने का दावा भी। लेकिन पिछले बार जो लिच्ची ने तांडव मचाया रहा चमकी बुखार के रूप में,उसे लेकर सरकार की तैयारी क्या है? ये खुद स्वास्थ विभाग ही नही जानती तो आम आदमी की बात ही व्यर्थ है।

कोरोना महामारी के कारण तालाबंदी का चरण- 4 के अभी 44 दिन शेष हैं और 5 वें चरण की सुगबुगाहट तेज़ हो गयी है। बंगाल की खाड़ी में जनित चक्रवात अम्फान बिहार में अपना कहर बरपा गयी है। अब बारी है बाढ़ की। उम्मीद है कोशी मैया सरकार के भांति बिना तैयारी के नही आएगी क्योंकि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ,पुणे ने इस वर्ष अच्छी मानसून होने का अनुमान लगाया है। जब प्राकृतिक आपदाओं की इस श्रृंखला को देखते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि सबसे ज़्यादा विपदा अन्नदाता के द्वार पर ही आया है और आगे आने वाला है।

कृषि रोड मैप 2017-22 की घोषणा सुशासन बाबू ने बहुत ही उत्साह से किया था। दावा यह था कि पिछले दो रोड मैपों ने उम्दा प्रदर्शन किया है। उम्मीद है यह जुमला नही होगा। खैर, इस रोड मैप में सुशासन बाबू देश के हर थाली में एक बिहारी व्यंजन का सपना देखा।चूंकि यह सपना था इस लिए सुबह होते बिखर गया ऐसा तो नही हो सकता और यदि ऐसा है तो सरकार इसे निश्चय में शामिल कर लें। क्यंकि निश्चय का सफलता कार्ड नोकरशाह बड़े ही तन्मयता से तैयार कर रहे हैं।मौजूदा दौर में जो किसानों की दशा है उसमें उनके स्वयं की थाली में अनाज मयस्सर नही है तो देश की थाली की बात ही छोड़ दीजिए।

कृषि राज्य सूची का विषय है । इसलिए इस संदर्भ में सम्पूर्ण जिम्मेदारी भी राज्य सरकार की ही है। लेकिन बिहार में कृषि,कृषि सम्बंधित कार्य, पूर्ति श्रृंखला, शीत भंडार गृह, मत्सपालन, दुग्ध उधोग सब की हालत कमोबेश एक जैसी यानी ख़राब है। राज्य की 77% कार्यबल कृषि कार्य मे लगा हुआ है एवं कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार है। राज्य में अभी रबी की फसलों का विक्रय करने के लिए कृषक औने-पौने भाव पर तैयार हो रहे हैं फिर भी उनका फसल बर्बाद हो रहा है क्योंकि मुक्कमल व्यवस्था तो कभी राज्य में इनके लिए की ही नही। कृषि मंडी कृषि के अतिरिक्त शेष कार्यो हेट ज्यादा प्रयोग की जा रही है। किसानों को न्यनतम समर्थन मूल्य भी नही मिल रही है। स्वामीनाथन आयोग का समस्त सुझाव यहां दफ्तरों के टेबल पर धरे हुए हैं। मक्का का किसानों ने प्रचुर मात्रा में उत्पादन किया उत्पादन भी हुआ है। हालांकि अम्फान चक्रवात और मौसमी मार ने फसल बर्बाद किए हैं लेकिन उससे ज्यादा फ़ाइल संस्कृति ने ।
यहां बिहार के बगल के राज्य ओडिशा के जिक्र करना जरूरी है। ओडिशा की भी स्थिति बहुतहद तक बिहार जैसी ही है लेकिन वहां राजनीतिक इच्छा शक्ति थोड़ी सुदृढ़ प्रतीत होती है। वहां की सरकार अपने किसानों के लिए कालिया योजना चला रखी है ,जो भारत सरकार के प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की ही भांति है। बस अंतर यह है कि केंद्र सरकार ₹6000 वार्षिक की धनराशि देती है जबकि ओडिशा सरकार ₹10000 की धनराशि। 
दूसरा तालाबंदी के दौरान कृषकों को राहत पहुंचाने के लिए ओडिशा सरकार ने संविदा कृषि (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) को अनुमति शर्तों के साथ प्रदान की है। इसके तहत उत्पादक फ़सल उत्पादन से पूर्व ही कृषक से उस फ़सल की निश्चित मात्रा के कार्य करने का समझौता कर लेते हैं। इस तरह कृषक की न केवल आय सुनिश्चित हो जाती है अपितु भंडारण, मंडी के चक्कर से भी छुटकारा मिल जाता है। 
यहां यह उदधृत करना जरूरी है कि पिछड़े राज्य के दर्जे के साथ विशेष पैकेज का मांग बिहार के साथ ओडिशा भी कर रहा है। फर्क सिर्फ इतना नज़र आता है कि वो इसे अपने नाकामी का आधार नही बनने दे रहा है और हम इस बैसाखी का जाप नही छोड़ रहे है।

चुनाव आते शायद इस बार विशेष राज्य के दर्जे की मांग ज़ोरों से न सुनाई दे क्योंकि केंद्र में राज्य गठबंधन वाले दलों की है सरकार है। यहां मैं अपने पाठकों को थोड़ा संविधान के प्रावधान से रूबरू कराकर इनके माया जाल से बाहर निकालने का प्रयास करना चाहूंगा। विशेष राज्य के दर्जे के बाद राज्य केंद्र से अधिक राशि पाएगा। ऐसे राज्यों के लिए संविधान के अनुच्छेद 275 में केंद्रीय अनुदान के रूप में वर्णन है। सुशासन बाबू ने एक पुस्तक ही लिख दी कि क्यों दर्जा मिलना चाहिए। यह सत्य है कि पुस्तक में उन्होंने आधरो के साथ साथ सभी चुनोतियो का भी वर्णन किया है, जो अब भी वैसे ही हैं।तो वहीं केंद्र इसपर वित्त आयोग के मानदंड और सिफारिशों का बाध्यता बताता है। इस राजनीतिक चाल को बस बिहार की भोली-भाली जनता नही समझ पा रही है। अगर सही में केंद्र देना चाहती है और वास्तविकता में राज्य प्राप्त करना चाहती है तो राज्य संविधान के अनुच्छेद 282 के तहत विशेष अनुदान ले सकती है। इसके लिए न केंद्र को संसद से मंजूरी की जरूरत है और न ही राज्य को किसी मानदण्ड पर खरे उतरने की। बस जरूरत है तो केंद्र और राज्य स्तर पर कल्याणकारी मानसिकता की।

सबल,सुदृढ़,सुंदर और आत्मनिर्भर बिहार का सपना अन्नदाताओं की अवहेलना कर कभी भी पूरा नही किया जा सकता है। 1967 के हरित क्रांति के प्रभाव से वंचित बिहार आज भी उन्ही समस्याओं से जूझ रहा है। समस्त प्राकृतिक अनुकूलता होने के बावजूद तकीनीकी अभाव, भूमि बन्दोबस्त का अभाव, फसल पूर्व सामग्री यथा बीज की अनुपलब्धता, कम जागरूकता, कृषक योजनाओ का लाल फीताशाही के भेंट चढ़ना, पूर्ति श्रृंखलाओं की अनुपस्थिति, शीत भंडार गृह की अपर्याप्तता, कृषि आधारित उधोगों का बंद होना कुछ ऐसे कारण हैं जो राज्य के अन्नदाताओं की स्थिति दयनीय बनाये हुए है।
यही कारण है कि अतीत में मगध, वैशाली और अंग जैसे समृद्ध महाजनपदों वाला अपना यह राज्य आज निर्धनता और मानव विकास सूचकांक के निम्न स्तरीय राज्यों के समूह में शामिल है। 

कड़क मिजाजी के लिए रिपुदमन का लेख


कड़क मिज़ाजी के Facebook और Telegram चैनल से जुड़ने के लिए क्लिक करें-

FACEBOOK PAGE LINK 

TELEGRAM CHANNEL LINK

No comments:

Post a Comment

आपको यह कैसा लगा? अपनी टिप्पणी या सुझाव अवश्य दीजिए।

Post Bottom Ad

Pages