क्या राजनीतिक दलों द्वारा हिन्दू न्यायालय के खोले जाने पर और उसकी पहली जज के नफ़रत भरे बयान की आलोचना नहीं कि जानी चाहिए थी?
उत्तर प्रदेश में हिन्दू महासभा ने हिन्दू न्यायालय सिर्फ इसलिए खोल लिया क्योंकि देशभर में शरिया न्यायालय भी मौजूद हैं। और धार्मिक मामलों को देखते हैं उसी प्रकार हिन्दू न्यायालय हिंदुओं के मामलों को देखेंगे। हिन्दू महासभा ने पहले हिन्दू न्यायालय की जज बनाया है डॉ पूजा शकुन पांडे को, जिन्होंने अभी हाल ही में कहा था कि "यदि मैं आदरणीय नाथूराम गोड़से से पहले पैदा हुई होती तो महात्मा गांधी को खुद गोली मार देती।"
जब पांडे ये बयान दे रही थीं तो उनके पीछे गले में माला पहनाई हुई गोड़से की मूर्ति को साफ-साफ देखा गया। पहले तो एक जज को पूरी तरह निष्पक्ष होना चाहिए। और पांडे तो पहली ऐसी जज बनी हैं जो उस व्यक्ति को गोली मारने की बात कहती हैं जिसे भारत में राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया है। एक ऐसा व्यक्ति जो खुद कानून को हाथ में लेने की बात करता हो, वो क्या किसी को कानून के अंतर्गत न्याय देगा। इस बात का बखूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
यदि ऐसा ही चलता रहा तो हर धर्म के लोग अपनी मान्यतानुसार धार्मिक न्यायालय खोलने की चेष्टा करेंगे। फिर इस तरह तो भारतीय संविधान और भारतीय संविधान आधारित न्याय व्यवस्था की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाएगी। इस तरह तो ये साफ तौर पर हमारे संविधान और न्यायिक व्यवस्था का अपमान हुआ। अब सवाल ये उठता है कि सरकारें कबतक वोटों की खातिर इस अपमान को होते देखती रहेंगी?
धार्मिक आधार पर न्यायालय को खोला जाना कितना उचित है? इस विषय पर संसद में बिना वोटों का नफा-नुकसान देखे सभी दल अविलंब चर्चा करें...।
भारतीय जन संचार संस्थान से 'हिमांशु प्रियदर्शी' की रिपोर्ट।


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