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Tuesday, August 28, 2018

पीले पन्नों की वो अनकही यादें....

पीले पन्नों की वो अनकही यादें....

(नदियां हमेशा बहा नहीं करती)

रसिका, जैसे मुझसे खो (गुम) सी गई हैं। जब भी मैं कभी आसमान के तारों को निहारता हूँ, वो मुझे याद आ जाती हैं। इसी एक क्षण में डूब जाने के लिए मैं दिन से रात होने का इंतजार करता हूँ। ताकि उस समय को मैं जी भर के जी सकूँ। अब भी याद है कि सर्दी की उस ठरी हुई काली रात में कोहरे की गर्मी की तलाश में अंजान सड़कों पर भटक रही एक लड़की रसिका थी। ये कैसी तलाश थी उसकी नज़रों में? किसने उसके पैरों में आवारगी बांध दी थी? 

कितना अजीब लगता है अपने ही शहर में किसी का पीछा करना और बिना किसी पते के उसे ही ढूंढने का यत्न करना। ये कितना अजीब लगता है न कि जिसकी बाहों की पनाह बनना हो उस भगौड़े के आगे ही आगे दौड़ते रहना और मोहब्बत की गिरफ्त में आने से छिपते रहना। क्या यही मोहब्बत है? अरे ऐसी मोहब्बत से तो चुप भली!

थक हार कर एक पेड़ के नीचे खड़ी रसिका अभी भी जैसे मेरी आँखों के सामने ही है। हाँ... तलाश के उस सफर में रसिका ने लिखा था--- तुम्हें बताऊंगी पर तुम यकीन नहीं करोगे, पर मैंने वहीं पेड़ के नीचे तीन रातें और पौने तीन दिन बिताए।

तौबा! इस तरह भी कोई मोहब्बत कर सकता है। ऐसा जुनून तो सिर्फ रसिका के हिस्से में आया है। पहले में र यानी रसिका के बारे में कुछ नहीं जानता था लेकिन अपनी कल्पनाओं से उसे जान ही लिया। रसिका जब भी मुझे खत लिखती तो वो हमेशा पीले पन्ने पर ही लिखकर भेजती। जब उनका पहला खत मिला तो अशांत मन को ख्याल आया कि कहीं ये पीला रंग रसिका के मन के मौसम का रंग तो नहीं है। वो सारे खत अब एक-एक करके बहुत सारे हो चुके थे कर मैंने उन्हें बड़े ही श्रद्धा से संभाल कर रखा था, मोह भरी यादों की तरह। उन पीले पन्नों के सारे शब्द तो काले थे पर वह काले पैन से काले लेख नहीं लिखती थी बल्कि मोहब्बत का चित्रण करती थीं। 

पुरानी फाइलों को इधर-उधर करते हुए मैन उन पीले पन्नों को इस तरह चुना था मानो को बालक समुद्र के किनारे बैठकर सीपियाँ चुन रहा हो। उन चिट्ठियों में कोई तारीख नहीं थी। धूप की उम्र से लेकर परछाईं के ढलने की उम्र तक उनके लिखे खत और यादें आज भी मेरी कल्पनाओं में समाहित हैं। 

हालांकि रसिका को में कभी न देख पाया और न ही वे मुझसे मिल पाईं। हाँ.... एक खत में उन्होंने कुछ लिखा था---

मुझे डर था कि वो 
मुझे किसी चौराहे पर
खड़ा करके कहेगा- अलविदा
पर उसने ऐसा कहाँ किया
जब भी में यहां से निकलूँ, तुम मुझे
ऐसे ही खड़ी मिलना....
वक्त को नज़दीक न आने देना
मुझे तुम्हारे इसी उम्र से इश्क़ है
सो, में दावे से कहती हूँ
वह मुझे वाकई प्यार करता है
नहीं तो वह भी किसी चौराहे पर 
खड़ा करके न बोल देता
अलविदा!...'

बस इस नज़्म के खत्म होते ही सांसे मानों थम सी गईं, वक्त रुक सा गया पर रसिका (मेरी कल्पना) आज भी उसी तरह मेरे दिलो दिमाग मे घर कर गयी है, जिससे बाहर आ पाना अब बेहद मुश्किल है। ये बिल्कुल सत्य है हमेशा नदियां भी तो नहीं बहा करतीं.....

बस यही कल्पनाएं तो जिंदगी हैं....

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