पिछले कुछ वक्त से देखा जा रहा है कि भारतीय वाणिज्यिक बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ रहा है। जिसकी वजह से वाणिज्यिक बैंकों की रिजर्व बैंक से ली गयी उधारी भी बढ़ी है। अर्थव्यवस्था में बैंकों का कर्ज इस समय 91.11 करोड़ रुपए हो गया है। और इसमें करीब 15% की बढ़ोतरी हुई है।
वहीं रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक वाणिज्यिक बैंकों का रिजर्व बैंक से लिया गया कर्ज भी पिछले साल की तुलना में नवंबर के मध्य तक 331.6% बढ़ा है ।गौरतलब है कि एनपीए वह राशि या पैसा होता है जो कोई भी बैंक किसी भी व्यापारी या आदमी को उधार देता है । और वह आदमी उस पर अपना ब्याज या कभी-कभी ब्याज के साथ-साथ लिया गया मूलधन भी वापस नहीं करता है । आमतौर पर एनपीए को तय करने की समय सीमा 90 दिन की होती है और इसकी समय सीमा बढ़ भी सकती है।
यहां पर जानने वाली सबसे जरूरी बात यह है कि जो भी पैसा वाणिज्यिक बैंकों की तरफ से लोगों को उधार के रूप में दिया जाता है । वह वही पैसा होता है जो बैंकों के ग्राहक बैंक में जमा कराते हैं । अब अगर कोई ग्राहक या बड़ी संख्या में ग्राहकों का समूह अपना पैसा बैंक से निकालने लगे तो बैंकों को पैसा ग्राहकों को वापस देना पड़ता है ,बढ़े हुए npa की दशा में बैंकों के पास ग्राहकों को उनका पैसा लौटाने में समस्या होती है और बैंक ,रिजर्व बैंक से उधार लेते हैं । जिसका नतीजा यह निकलता है कि rbi अपना रेपो रेट बढ़ा देती हैं । और जब वाणिज्यिक बैंकों को महंगा कर्ज मिलता है तो वो भी अपनी उधारी पर ब्याज की दर को बढ़ा देते हैं।
रिजर्व बैंक से बढ़ी उधारी की एक वजह बाजार में नकदी की कमी का होना भी है । जिस वजह से गैर वाणिज्यिक कंपनिय भी धन की जरूरतों के लिए बैंक का रुख कर रहीं हैं। बाजार में कम नकदी होने की एक वजह नोटबंदी को माना जा सकता है । रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2017 के अंत तक रिजर्व बैंक से ₹1.2 लाख करोड़ रुपये उधार लिए गए और इस साल मार्च में ही बैंकों के द्वारा ₹4.6 लाख करोड़ रुपये उधार लिए जा चुके हैं। चालू वित्त वर्ष में रिजर्व बैंक से उधारी पिछले वर्ष की समान अवधि के 1.2 लाख करोड़ रुपए की तुलना में 4 गुना अधिक है। सीधे तौर पर यह समझा जा सकता है कि पूरी तरह से तो नहीं पर NPA और बाजार में नकदी की कमी एक बड़ी वजह साबित हो रही है जिससे कि वाणिज्यिक बैंकों को RBI से उधार लेना पड़ रहा है ।
हालांकि सरकार ने भी इस समस्या से निपटने के लिए बैंक पुनर्पूंजीकरण और fugutive economic offender जैसे कदम उठाए हैं पर अभी के हालात से निपटने के लिए वह सब नाकाफी साबित हो रहे हैं।
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आइए अब आपको कुछ कठिन इकोनॉमिक्स और बैंकिंग से जुड़े शब्दों और टर्म्स को आसान भाषा में बताने की कोशिश करते हैं ।
*NPA- जब कोई भी बैंक किसी को उधार देता है तो उस दिए गए उधार पर वह कुछ ब्याज भी लगाता है जिस ब्याज से बैंक की कमाई होती है । अब अगर जिसे बैंक ने कर दिया है या उधार दिया है वह 90 दिन तक (कभी कभी यह वक्त कम या ज्यादा भी हो सकता है )अपना धन नही चुकता है या फिर पैसा लेकर फरार हो जाता है। तो उस स्थिति को बैंक की भाषा में 'नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स' या 'गैर निष्पादित पूंजी' कहते हैं। सरल भाषा या गैर बैंकिंग की भाषा में इसे एक ऐसी पूंजी जिसका फायदा बैंक को नहीं मिल रहा है कहा जा सकता है।
*वाणिज्यिक बैंक- आम बोलचाल की भाषा में यह वह बैंक होते हैं जिन्हें हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में देखते हैं या जिन बैंको से हम रूबरू होते है। जिन में हमारा खाता होता है या फिर जिसे हम उधार लेते हैं जैसे कि एसबीआई ।
*रिजर्व बैंक या सेंट्रल बैंक- वह बैंक जो किसी भी देश में बैंकों को लाइसेंस देने और उन पर नियंत्रण करने का काम करता है भारत में इसे रिजर्व बैंक और बैंकिंग की भाषा में इसे सेंट्रल बैंक कहा जाता है इसे बैंकों का बैंक भी कहते हैं।
*रेपो रेट- यह वह दर होती है जिस पर वाणिज्यिक बैंक रिजर्व बैंक से उधार लेता है अगर रिजर्व बैंक इसे बढ़ा दे ,तो हमें मिलने वाला कर्ज भी महंगा हो जाएगा और अगर घटा दे तो कर्ज सस्ता हो जाएगा।
*रिवर्स रेपो रेट- जिस तरह से वाणिज्यिक बैंक रिजर्व बैंक से पैसा लेते है, उसी तरह से रिजर्व बैंक भी वाणिज्यिक बैंक से जिस दर पर पैसा लेता है उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं यह हमेशा रेपो रेट से दशमलव 5% कम होता है ऐसा आरबीआई बाजार से महँगाई की दशा में पैसा वापस उठाने के लिए करता है।
*C.r.r- भारत के बैंकिंग नियम के मुताबिक हर बैंक को तय नगदी का एक हिस्सा आरबीआई के पास रखना पड़ता है जिसे कैश रिजर्व रेशियो कहते हैं।
*S.l.R- यह वादा है जिस पर बैंक अपना पैसा सरकार के पास रखते हैं ऐसा नगदी के चलन को काबू करने के लिए किया जाता है।।
*M.s.f- आरबीआई ने पहली बार 2011- 12 की मॉनेटरी पॉलिसी में इसका जिक्र किया था यह कॉन्सेप्ट 9 मई 2011 को लागू हुआ इसमें सभी वाणिज्यिक बैंक एक रात के लिए अपने कुल जमा का 1 फ़ीसदी तक लोन ले सकते हैं यह सुविधा शनिवार को छोड़कर सभी वर्किंग डे में मिलती है।
*बैंक पुनर्पूंजीकरण- बैंकों के पास पैसा कम होने के कारण आरबीआई या सरकार के द्वारा जो पैसा बैंक में डाला जाता है उसे बैंक पूंजीकरण कहते हैं । यह
स्थिति तब उत्पन्न होती है जब बैंकों का एनपीए बहुत ज्यादा पड़ जाता है और बैंकों को अपना काम करने के लिए पैसों की कमी महसूस होती है।
भारतीय जन संचार संस्थान , नई दिल्ली से अभिषेक नंदन की रिपोर्ट।


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