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Friday, November 30, 2018

क्या पेड़ से लटकना या भूखे मरना ही लिखा है किसान की किस्मत में?


देश की राजधानी दिल्ली के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास स्थित है ऐतिहासिक रामलीला मैदान। रामलीला मैदान इतिहास की कई बड़ी घटनाओं का साक्षी रहा है। 1975 का जेपी आंदोलन किस को याद नहीं होगा, जेपी ने इसी मैदान से इंदिरा की सत्ता को जनता का प्रतिनिधि बनकर चुनौती दी थी।
याद करिए 2011 का अन्ना आंदोलन ” इंडिया अगेंस्ट करप्शन” के नारे तले देश की जनता खासकर युवा अन्ना के साथ रामलीला मैदान में जमा हो गई थी। 2014 में हुए सत्ता परिवर्तन की मुख्य वजहों में अन्ना आंदोलन और रामलीला मैदान का खास महत्व है।

इस बार रामलीला मैदान, किसान आंदोलन का साक्षी बन रहा है ।
29 और 30 नवंबर को ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति ने “किसान मुक्ति मार्च” का आयोजन आयोजन किया है। इस मार्च में 200 से अधिक किसान संगठन शामिल हो रहे हैं। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से किसान दिल्ली पहुंचे हैं और अपनी मांगों को लेकर रामलीला मैदान में प्रदर्शन कर रहे हैं। अपनी मांगों को लेकर किसान संसद का घेराव भी करेंगे।
किसानों की मुख्यतः दो बड़ी मांगे हैं। पहली, न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को मंजूरी दी जाए। दूसरी, कर्ज माफी संबंधी कानून संसद में पारित किया जाए।
मोदी सरकार ने 2014 के अपने घोषणा पत्र में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का वादा किया था और न्यूनतम मूल्य लागत प्लस 50 फीस देने का वादा किया था। लेकिन सत्ता में आने के साल भर के भीतर ही सरकार अपने वादों से पलट गई। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि सरकार ने ऐसा कोई वादा किया ही नहीं था।

जमीनी हकीकतों को देखा जाए तो किसान पूरे देश में बदहाल स्थिति में है। लेकिन दूसरी तरफ सरकार यह कहने से नहीं चूकती है कि वह किसानों की हमदर्द है। केंद्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन अभी तक उस और कुछ ठोस काम होता दिख नहीं रहा है।
किसानों को मरहम लगाने के लिए मोदी सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लेकर आई। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस योजना से केवल बीमा कंपनियों ने ही अपनी जेब भरी है।
फसल का सही दाम ना मिलने से और कर्ज तले दब जाने के कारण लगातार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 1995 से 2015 के बीच यानी 20 साल में तीन लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। यह केवल सरकारी आंकड़े हैं लेकिन वास्तविक हकीकत तो कुछ और ही है।
                 
किसानों की मांग है कि उनकी समस्याओं पर बहस के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए और किसानों की कर्ज माफी और फसल की कीमतों पर जो बिल सदन में पेश हो चुके हैं उन्हें पारित किया जाए।रामलीला मैदान में इन्हीं सब मांगों को लेकर किसान जमा हुए हैं
इन दोनों बिलों को 20 से अधिक राजनीतिक दलों ने समर्थन देने का वादा किया है ।

अब देखना दिलचस्प होगा कि इस किसान आंदोलन का परिणाम क्या निकलेगा? क्या किसान और विपक्षी राजनीतिक दल सरकार को मांगों को पूरा करने को लेकर दबाव बना पाएंगे?
2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भी इस आंदोलन को देखा जा सकता है। जिस प्रकार पूरा विपक्ष इस आंदोलन को समर्थन कर रहा है,इसे देखकर तो यही लगता है कि विपक्ष जनता में अपनी साख को मजबूत करने के लिए इस आंदोलन में शामिल हुआ है। वर्तमान में विपक्ष की जो स्थिति है उससे हर कोई वाकिफ है। विपक्ष जहां मुद्दों को ठीक से उठा नहीं पा रहा है और अभी तक 4 सालों में मोदी सरकार को ठोस सबूतों के साथ घेर नहीं पाया है तो ऐसे में विपक्ष की मंशा इस आंदोलन से राजनीतिक लाभ उठाना ही लगता है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या विपक्ष किसानों के कंधे पर सवार होकर 2019 के लोकसभा चुनाव में फतह हासिल कर पाएगा?
तब तक इंतजार करिए,क्योंकि अब “जिंदा कौमे भी 5 साल इंतजार करने लगी है।”
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भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली से कृष्ण मुरारी की रिपोर्ट।


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