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Friday, November 30, 2018

देश का सबसे बड़ा श्रमिक वर्ग आज भी क्यों अपनी पुरानी पीड़ाओं के दर्द से कराह रहा हैं?


सरकार सहित देश की तमाम पार्टियां जहाँ 2019 के लिए खुद को तैयार करने में लगी हुई हैं, वही दूसरी तरफ देश का सबसे बड़ा श्रमिक वर्ग आज फिर अपनी पुरानी पीड़ाओं के दर्द से कराह रहा हैं। आज फिर एक बार देश के तारणधार और अन्नदाता दिल्ली में एकजुट हुए हैं। मुझे डर हैं कि कही फिर से कुछलोग इसे चुनावी स्टंट जैसा कुछ घोषित करार न कर दे। अपना एजेंडा सेट करने के चक्कर में वह शायद यह न देख पाए की क्यों 208 किसान संगठन आज फिर एकजुट हुए हैं?

असल में हमारे किसान भाईलोग भी बहुत भोले हैं। मैं तो कहता हूँ की बस अपने-अपने घरों में 6 महीने का अनाज स्टॉक करे और बैठ जाएं अपने खेतों में हड़ताल पर। पूरे देश की अर्थव्यवस्था न चरमरा गई तो फिर कहना। लेकिन नही, उम्मीद लेकर हर बार यह इसी तरह आते हैं और निराश होकर लौट जाते हैं। यह प्रक्रियाएं चलती रहती हैं, आत्महत्याएं बढ़ती रहती हैं और समस्याओं के समाधान के नाम पर कुछ योजनाएं लागू कर दिए जाते हैं जिनका फायदा या तो बैंकों को होता हैं या बीमा कंपनियों को।


वास्तव में हैं क्या की जब तक परेशानी हमारी नही होती.. हम उस दर्द को, तकलीफ को समझ नही पाते। देश के सभी विधायक, सांसद, मंत्री और ऊँचे पद पर आसीन हरएक व्यक्ति यह भूल जाता हैं की वह इस देश की जनता का एकमात्र सेवक हैं। सरकारी खजाने से मिलने वाला धन और तमाम तरह की सुख-सुविधाएँ इतनी पर्याप्त होती हैं उनके लिए की किसानों की तकलीफ, युवाओं का असंतोष और महँगाई से त्रस्त आवाम..उन्हें कुछ नजर ही नही आता। या यूँ कहे, वह देखना ही नही चाहते।


1 साल काफ़ी नही होता, 2 साल भी काफ़ी नही होता, लेकिज 10 - 15 साल चीज़ों को सुधारने व समस्याओं का हल करने के लिए काफी होते हैं। आखिर क्यों हैं ऐसा की पिछले 10-15 सालों में हम इस दिशा में बेहतर काम नही कर पाएं। क्यों वर्तमान सरकार यह भूल गयी की उसने चुनावी मुद्दों में किसानों की खुशहाली का वादा किया था? क्यों किसानों की समस्याओं को बार- बार नजरअंदाज कर दिया जाता हैं? क्या उनकी आत्महत्याएं देश को विचलित नही करती। 


आप सोच कर देखिये की पूरे देश को खाना उपलब्ध कराने वाला एक बहुत बड़ा वर्ग भूखा मरा जा रहा हैं। क्या यह दुःखद व चिंताजनक नही? ऐसा सिर्फ मैं नही कहता, आंकड़े कहते हैं..गूगल कर लीजिए आप। साल दर साल किसानों की आत्महत्याएं घटने के बजाय क्यों बढ़ती ही जा रही हैं। क्यों आत्महत्या नाम का शब्द किसान का पर्यायवाची बनता जा रहा हैं? ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न हैं जिनका उत्तर तलाशने में हम अबतक असफल रहे हैं। अगर अब भी इस दिशा में प्रतिबद्ध होकर काम नहीं किया गया तो भविष्य में बेहद गंभीर समस्या का सामना करने के लिए हमें तैयार रहना होगा। क्योंकि यह सिर्फ भावनात्मक जुड़ाव का मामला नही हैं, यह हमारी जरुरत व आवश्यकता का मामला हैं। 

- आशीष झा

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