प्रिय,
तुम ठीक हो? हाँ यही जानने के लिए महीने-दो महीने पर तुम्हें एक बार कॉल कर लेता हूँ और बदले में मुझे गालियाँ मिल जाया करती हैं। मैं अपनी सफाई में कुछ नहीं कह पाता। दरअसल नशा, चेतवानी नहीं पढता। हाँ बाद में जब दर्द उठता है तो कूड़े में फेंक दी गई पैकेट को उठाकर वह अपने दर्द की वजह को समझने की कोशिश जरूर करता है। पर शायद तब तक देर हो चुकी होती है। प्रेम की आदत अब तक ख़त्म नहीं हुई। आदतें ख़त्म नहीं होती, हाँ समयानुसार कम-ज्यादा हो जाया करती हैं।
जीवन ख़राब जिल्दों वाली किताब थी। हजारो किताबों के ढेर से न जाने तुमने क्यों इसी किताब को चुन लिया था? जिल्द बेहतर हो या ख़राब उसके भीतर है तो एक कहानी ही। फिर कभी किसी खाली समय में कोई पढ़ेगा, और फेंक देगा। या फिर कुछ दिन के लिए सजाकर कर रख लेगा। जैसे तुमने सजा लिया था।
वर्षो के इंतज़ार के बाद मिली चीजें इंसान को डरपोक बना देती है। खोने का डर। मेरे लिए डर, एक बेहतर अनुभव रहा है। खुद को किसी के सामने गलत न होते हुए भी समर्पित कर देता हूँ। और मैंने इससे कईयों रिश्ते बचा लिए हैं सिवाय तुम्हारे. तुम्हें क्यों नहीं बचा पाया, नहीं मालूम। मालूम होना भी नहीं चाहिए। प्रेम की मिठास ख़त्म होने लगती है। वजहें आगे बढ़ जाने के लिए कहती है। और वजहों की गैरमौजूदगी भीतर के एकतरफा प्रेम में हर रोज जान भरती है। वो इन्तजार करवाती हैं। क्योंकि बेवजह प्रेम का टूट जाना सामने वाले को कभी गलत नहीं कहता, वह खुद को रोज दोष देता है। और अपने भीतर के प्रेम को रोज सींच कर उपजाऊ करता जाता है।
तुम्हें लगता है कि तुमने मुझे अपने जीवन से फेंक दिया है। लेकिन उन सीढियों पर तुम मुझसे अब भी बात किया करती हो जहाँ मैं और तुम दुबककर बैठे थे कभी। वो पार्क भी जिसमे मेरे भूखे बैठने पर तुमने माँ जैसा स्नेह दिया था। तुम्हारा पता मुझे नहीं मालूम, हाँ तुम्हारे शहर की बालकनी में टंगा हरेक हरा दुपट्टा तुम्हारा होना महसूस कराता है। और वो चाय की दुकान भी। तुम फ़ोन पर कहा करती थी कि तुम अकेले चाय पीते हो, मेरे साथ चाय कब पिओगे? ईश्वर तुम्हें सुख दें। और मुझे ताक़त।
तुम्हारा (नहीं कहूंगा)
देवपालिक।
देवपालिक
भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली से।


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