आखिर राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद है क्या और कब से है?
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार 1853 में इस जगह को लेकर पहली बार दंगा हुआ था। जबकि 1885 में महंत रघुवरदास ने फैजाबाद जिला कोर्ट में अपील दायर की। जिला जज ने अपने फैसले में कहा की चूंकि मस्जिद का निर्माण 336 साल पहले हो चुका है लिहाजा इस पर फैसला करना मुनासिब नहीं होगा।
आजाद भारत में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद 21-22 दिसंबर 1949 की रात को हुआ। कुछ लोगों ने रामलला की मूर्ति विवादित स्थान पर प्रकट होने का दावा किया। पूरे अयोध्या में इसको लेकर चर्चा होने लगी। 23 दिसंबर 1949 को फैजाबाद थाने में एफआईआर दर्ज की गई। जिसका नंबर था 167/49। इस पूरे मामले को इसी एफआईआर नंबर के नाम से भी जाना जाता है।
इस घटना की खबर मिलने के बाद अयोध्या के आसपास के क्षेत्रों में गहमागहमी बढ़ गई और प्रशासन ने विवादित स्थान पर आवाजाही पर रोक लगा दी।
आवाजाही पर रोक लगाने के खिलाफ 1950 में गोपालदास फैजाबाद जिला अदालत चले गए और प्रशासन पर आरोप लगाया कि उन्हें वहां पूजा पाठ करने की इजाजत नहीं दी जा रही है। बाद में मुस्लिम पैरोकार भी यह कहते हुए कोर्ट चले गए कि 21- 22 दिसंबर की रात विवादित स्थान पर मूर्ति प्रकट नहीं हुई थी बल्कि उसे चोरी छिपे वहां रखा गया था।
पूरा मामला अदालत में प्लॉट नंबर-583 के मालिकाना हक का था। मामला अदालत में ही था कि 1986 में एक बड़ा मोड़ आया। जिस जगह मूर्ति प्रकट होने की बात कही गई थी, फैजाबाद जिला अदालत के जज के आदेश के बाद वहां का ताला खुलवा दिया गया। तब प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। हालांकि फैसला अदालत का था लेकिन सरकार ने जिस रफ्तार से इसे लागू किया उससे कई गंभीर सवाल सरकार पर उठे। जिला प्रशासन ने डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के फैसले को 40 मिनट में ही लागू कर दिया था। ताला खुलवाने की घटना को दूरदर्शन पर लाइव प्रसारित किया गया था।
ताला खुल जाने के बाद हिंदूवादी संगठनों ने मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन तेज कर दिया।
विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में देश के अलग-अलग जगहों में शिला पूजन किया गया और उसे अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई। अयोध्या में शिलान्यास कार्यक्रम का दिन भी करीब आ रहा था। इसी मकसद से 17 अक्टूबर 1989 को वीएचपी के नेताओं ने तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह से मुलाकात की और आश्वासन मांगा की इसमें किसी प्रकार की रुकावट नहीं आनी चाहिए। सरकार ने दबाव में आकर शिलान्यास की अनुमति दे दी।
गृहमंत्री बूटा सिंह और तत्कालीन मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी की उपस्थिति में विवादित स्थान पर शिलान्यास करा दिया गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जहां अपने अनुषंगिक संगठनों के जरिए हिंदुओं को एक साथ लाने की कोशिश कर रहा था वही कांग्रेस भी यह दिखाना चाह रही थी कि वो भी हिंदुओं की रहनुमा है।
मुस्लिम समुदाय ने शिलान्यास का विरोध किया।
वहीं दूसरी तरफ शिला पूजन से देशभर में तनाव की स्थिति पैदा होने लगी थी।
साल 1989 में 706 दंगे हुए और इन दंगों में 1174 लोगों की मौत हुई। दंगों में सबसे अधिक मृत्यु बिहार के भागलपुर में हुई. दंगा शुरू होने के 2 दिन बाद यानी कि 26 अक्टूबर 1989 को राजीव गांधी ने भागलपुर का दौरा किया। भागलपुर में 2 महीने तक दंगे जारी रहे जिसमें लगभग 1000 लोग मारे गए। मरने वालों में ज्यादातर मुस्लिम लोग थे।
इसी बीच 3 नवंबर 1989 को राजीव गांधी फैजाबाद गए जहां उन्होंने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हम राम राज्य लाना चाहते हैं और मुझे हिंदू होने पर गर्व है।
1989 के दौरान राजीव गांधी पर बोफोर्स घोटाले में संलिप्तता के आरोप लगने लगे। उनके साथी और कांग्रेस नेता वीपी सिंह पार्टी लाइन से अलग होकर राजीव गांधी को घेरने लगे थे। इस मुद्दे से बचने के लिए राजीव के पास सॉफ्ट हिंदुत्व का सहारा लेने के सिवा और कुछ उपाय नहीं था। भ्रष्टाचार के मुद्दे के आगे राजीव गांधी की सॉफ्ट हिंदुत्व की डिप्लोमेसी की लाइन चली नहीं।
कांग्रेस 1989 का आम चुनाव हार गई। कांग्रेस से अलग हुए वीपी सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी जिसे भाजपा बाहर से समर्थन दे रही थी। जहां 1984 में भाजपा केवल 2 सीटों की पार्टी थी वहीं 1989 में उसका आंकड़ा 89 तक पहुँच गया।
प्रधानमंत्री बनते ही वीपी सिंह ने दोनों पक्षों को भरोसा दिलाया कि वो कुछ दिन में पूरे विवाद को हल कर देंगे। लेकिन आगे कुछ हो पाता तभी साधु- संतों ने 30 अक्टूबर 1990 को राम मंदिर निर्माण की घोषणा कर दी।
> दूसरी तरफ, वीपी सिंह ने पिछड़ी जाति के लोगों के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान कर दिया। इससे भाजपा को लगने लगा कि उसका सवर्ण वोट बैंक इसके लिए उसे ही जिम्मेदार मानेगा।
लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से अयोध्या तक 10 हज़ार किमी. की रथ यात्रा का एलान किया।
इसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर की सरकार बनी लेकिन वह ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं।
जब गिराया गया विवादित ढांचा
6 दिसंबर की सुबह से ही कारसेवक अयोध्या में जमा होना शुरू हो गए थे। चारों तरफ से बाबरी मस्जिद के ढांचे को कारसेवकों द्वारा घेर लिया गया। मस्जिद की सुरक्षा में पीएसी के जवान तैनात थे। ढांचे के चारों ओर लगी लोहे की रेलिंग को पार करके कारसेवक अंदर घुसने लगे और तैनात जवानों पर पत्थर बरसाने लगे। थोड़ी ही देर में कारसेवक ढांचे के सबसे ऊपरी हिस्से यानी कि गुंबद पर चढ़ गए और पहला ढांचा उनके द्वारा गिरा दिया गया। चारों तरफ धूल ही धूल फैल गई । "राम नाम सत्य है,बाबरी मस्जिद ध्वस्त है " के नारे चारों तरफ गूंजने लगे।
यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि - " 6 दिसंबर को लगभग 1:00 बजे सरकार के गृह मंत्री श्री एस. बी. चौहान साहब का मेरे पास फोन आया और उन्होंने कहा कि हमारे पास यह सूचना है कि कारसेवक गुम्बद पर चढ़ गए हैं। आपके पास क्या सूचना है? तो मैंने कहा कि मेरे पास थोड़ा सा एक कदम आगे की सूचना है कि कारसेवक गुम्बद पर चढ़ गए और कारसेवकों ने गुंबद को को तोड़ना भी शुरू कर दिया है।"
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया। असल विवाद इस मस्जिद को लेकर ही है। हिंदू धर्म के लोगों का मानना है कि जिस भूमि पर मस्जिद बनी हुई थी वह असल में भगवान राम की जन्म भूमि है।
मुस्लिम समुदाय के लोगों का मानना है कि यह जमीन मस्जिद की ही है जिसे लगभग 450 साल पहले बाबर ने बनवाया था ।
आजाद भारत का इतिहास इस घटना के बिना पूरा नहीं हो सकता।
हिंदू संगठनों का मानना है कि इस जगह पर पहले मंदिर हुआ करता था जिसे बाबर ने तुड़वाकर मस्जिद की नींव रखी।
राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद बीते 8 साल से सुप्रीम कोर्ट में है। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 30 सितंबर 2010 को 2:1 के बहुमत वाले फैसले में कहा था कि 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा,और रामलला में बराबर-बराबर बांट दिया जाए।"
इस फैसले को किसी भी पक्ष ने नहीं माना और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी।
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