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Wednesday, December 5, 2018

(पार्ट 2): नरसिम्हा राव का वो एक फैसला जिसने राम जन्मभूमि-बाबरी विवाद को दिया नया मोड़।

नरसिम्हा राव का वो एक फैसला जिससे यूपी की कल्याण सिंह सरकार गिर गयी

1991 में लोकसभा चुनाव हुए। लेकिन चुनाव के दौरान ही राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। लेकिन चुनावों में कांग्रेस पार्टी की वापसी हुई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद मुद्दा नरसिम्हा राव को विरासत में मिली। जहां एक तरफ कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रही वहीं दूसरी तरफ राम मंदिर के नाम पर भाजपा कई राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही।  उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश,राजस्थान, मध्यप्रदेश में भाजपा सत्ता में आई।

        जून 1991 में कल्याण सिंह यूपी के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के बाद मुरली मनोहर जोशी के साथ अपने पहले अयोध्या दौरे के दौरान कल्याण सिंह ने एक बहुचर्चित नारा दिया - " राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे "। अयोध्या दौरे के 15 दिन बाद ही कल्याण सिंह ने एक बड़ा फैसला किया। फैसला था विवादित ढांचा और उसके आसपास के 2.77 एकड़ जमीन के अधिग्रहण करने का। इतना ही नहीं राम जन्मभूमि न्यास को एक रुपए के लीज पर 2.77 एकड़ जमीन दे दी गई। मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अधिग्रहित जमीन पर पक्के निर्माण पर रोक लगा दी।

     वीएचपी के नेता लगातार कल्याण सिंह पर अयोध्या के आसपास सुरक्षा व्यवस्था में ढील देने के लिए दवाब बना रहे थे और अपने वफादार पुलिस अफसरों की तैनाती को क्षेत्र में तरजीह दे रहे थे।


        31 अक्टूबर को कारसेवक विवादित ढांचे को समतल करने में लग गए। कुछ कारसेवकों ने गुम्बद पर चढ़कर भगवा झंडा लहरा दिया।

           इलाहाबाद हाई कोर्ट ने  पक्के निर्माण पर रोक लगा रखी थी। इसपर  राम जन्मभूमि न्यास ने  सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी यूपी की कल्याण सिंह सरकार की है। इतना ही नहीं यूपी  सरकार की ये भी जिम्मेदारी है कि विवादित जमीन के अधिग्रहण पर  इलाहाबाद हाई कोर्ट कोर्ट के निर्देशों का पालन करें।

        इसके बाद संघ परिवार ने अपनी रणनीति में बदलाव किया।

           केंद्र सरकार ने यूपी में केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करने का फैसला किया लेकिन इसे लेकर कल्याण सिंह गृह सचिव पर  ही बिफर उठे। प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर कल्याण सिंह ने कहा कि क्या केंद्र राज्य में गृह युद्ध जैसा माहौल पैदा करना चाहता है और राज्य की पुलिस और केंद्र सुरक्षा बल के बीच टकराव पैदा करना चाहता है। इसके बाद प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने दोनों पक्षों से खुद ही बात करने की योजना बनाई।  राव इसपर विचार कर ही रहे थे कि वीएचपी ने मंदिर निर्माण की नई डेडलाइन सामने रख दी। 9 जुलाई से कार सेवा शुरू करने का ऐलान कर दिया गया।

           प्रधानमंत्री राव ने आडवाणी को अपने निवास पर बुलाकर कारसेवा रुकवाने का आग्रह किया। जवाब में आडवाणी ने कहा कि उनका धार्मिक नेताओं और साधु-संतों पर कोई नियंत्रण नहीं है। प्रधानमंत्री ने अपने निवास पर साधु-संतों से बातचीत कर उन्हें कारसेवा रुकवाने को कहा। जिसपर साधु-संत मैन गए और केंद्र सरकार को 3 महीने का समय दिया कि वह इस दौरान कोई ठोस कदम उठाएं।


        पूरे मामले को सुलझाने के लिए नरसिम्हा राव के पास केवल 90 दिन थे। केंद्र ने वीएचपी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के साथ बैठक करनी शुरू की। दोनों पक्षों  ने अपनी-अपनी दलीलें पेश की। लेकिन वीएचपी के केंद्रीय मार्गदर्शन मंडल ने अचानक ही 30 अक्टूबर 1992 को धर्मसंसद बुलाने का एलान किया और समझौता वार्ता रद्द करने का ऐलान कर दिया और फिर से पुरानी मांगों का राग अलापा जाने लगा और 6 नवंबर से कारसेवा शुरू करने का ऐलान कर दिया गया।
  

     तत्कालीन गृह सचिव माधव गोडबोले ने राज्यपाल के रिपोर्ट का हवाला देकर यूपी में कल्याण सिंह की सरकार को हटाने की योजना बनानी शुरू कर दी जिसका प्रधानमंत्री ने भी समर्थन किया।

        लेकिन नरसिम्हा राव बातचीत से ही इस मामले का हल निकालना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने 18-19 नवंबर को कल्याण सिंह  को बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया लेकिन बातचीत से मामला सुलझ नहीं पाया।
       
         25 नवंबर को नरसिम्हा राव ने तय किया कि राजपाल की की रिपोर्ट मंगवाई जाए और धारा 356 के तहत  यूपी सरकार को बर्ख़ास्त किया जाए। लेकिन इस योजना को पूरा नहीं किया जा सका।
            इलाहाबाद हाईकोर्ट  लगातार जमीन अधिग्रहण पर फैसला टाल रहा था। लेकिन इसके बावजूद लाखों की संख्या में कारसेवकों ने अयोध्या में डेरा डाल दिया था। विवादित ढांचे को गिराए जाने से  1 दिन पहले यानी 5 दिसंबर 1992 को आडवाणी और वाजपेयी ने बड़ी जनसभा को संबोधित किया। जिसमें अटल जी ने जमीन को समतल करने की बात कही थी। अटल-आडवाणी की जोड़ी लगातार केंद्र पर राम मंदिर निर्माण के लिए दबाव बना रही थी।
  

           आखिरकार 6 दिसंबर का दिन आ ही गया था। कारसेवकों ने विवादित ढांचे को गिराना शुरू कर दिया था।
     इस बीच दिल्ली में बैठी नरसिम्हा राव सरकार पर आरोप लगे कि केंद्र सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

      6 दिसंबर की देर शाम सुप्रीम कोर्ट ने पूरे घटनाक्रम की समीक्षा करते हुए ढांचे को तोड़े जाने पर अफसोस जताया।
    शाम में ही अस्थयी मंदिर बनाने का काम शुरू कर दिया गया।
    दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति को यूपी सरकार को बर्खास्त करने के लिए रिपोर्ट भेज दी। जिसके बाद राष्ट्रपति ने कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया।

क्रमशः भाग 3 में पढ़ें 
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भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से कृष्ण मुरारी का लेख 

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