ये रहा दो दिन के किसान आन्दोलन का हासिल । - KADAK MIJAJI

KADAK MIJAJI

पढ़िए वो, जो आपके लिए है जरूरी

Breaking

Home Top Ad

Saturday, December 1, 2018

ये रहा दो दिन के किसान आन्दोलन का हासिल ।


दो दिवसीय किसान आंदोलन आज समाप्त हो गया। 35 रुपये किलो का आटा, 150 रुपये लीटर का तेल , 20 रुपये किलो का आलू, महंगा कपड़ा और आइस प्रेस्ड गन्ने का जूस पीकर आप निश्चिंत हो जाते होंगे कि किसान ख़ुश होगा। आपने तो अपनी कमाई की अच्छी खासी रकम किसानों के नाम कर दी है। लेक़िन हक़ीक़त यह नही है। उसी हक़ीक़त को बताने किसान दो दिन तक सड़को पर था। आपको ट्रैफिक जाम का सामना भी करना पड़ा होगा। वो जाम लगाने ही तो आया था। क्योंकि उसके पास आपको अपनी परेशानी कहने का दूसरा कोई साधन कहाँ है?
आपको तकलीफ़ हुई होगी। इसके लिए किसानों ने माफ़ी के पर्चे भी बाँटे। सत्य के साथ खड़े होइये निरपेक्ष होना जरूरी नही। और सड़को पर इन दो दिनों का सत्य सिर्फ किसान था।
 पीले , हरे, लाल, नीले हर रंग के झंडे थे वहाँ। कुछ तो मटमैले चादर को फाड़कर ही झंडा बनाये हुए थे, फिर रात को वही ओढ़ कर रामलीला मैदान में सोए भी। हर आंदोलन में राजनीति हावी होती है, नहीं होगी तो आपका हमारा ध्यान भी नहीं जाएगा। पर यह हमें तय करना है कि हम किसके साथ हैं। मंच के ऊपर वालों के साथ या नीचे सड़क पर उम्मीद की टकटकी लगाने वालों के साथ। क्योंकि मंच के ऊपर की राजनीति और मंच के नीचे का संघर्ष हमेशा से समानांतर चला है। 
वहां जाकर कई किसानों की ऐसी समस्या जानने को मिली जिनका ज़िक्र कभी होता ही नहीं है। 

मैं दोनो दिन इस आंदोलन में रहा । जिन समस्याओं को मैं समझ पाया वही लिख रहा हूँ।
प्रश्न-
कुछ दिन पहले मैंने अपने बाउजी से कहा था कि कुछ साल दिल्ली में नौकरी करके मैं भी गाँव में रहके किसानी करना चाहता हूँ? तो उनका जबाब था कि नही जहाँ हो वही रहो किसानी में अब पैसा नही है।
आप अपने बेटे को लेकर क्या सोचते है। क्या उसका भविष्य किसानी में है?
जबाब-
आपके घर में किसानी के अलावा क्या होता है?
मैं- भाई व्यवसाय करते है।
तो फिर आपके पिता ऐसा सोच सकते है। मैं ऐसा नही सोच सकता।
"
ग़रीब का बाल-बच्चा है, कमाता है तो खाता है"। और हमारे पास खेती- किसानी के आलवा जीविका चलाने के लिए दूसरा कोई साधन नही हैं। हम छोटे किसान भी है और खेतिहर मजदूर भी। घर के कुछ लोग अपने खेत में काम करते है तो कुछ लोग दूसरों के खेत में मजदूरी।
बिहार के जहानाबाद जिले के सुंदर यादव और काजू यादव का ज़बाब था यह।
दोनों लोगो पर कोई कर्ज नही है। कर्ज़ के बारे में उनका कहना है कि" हम कर्ज़ लेंगे तो कहाँ से भरेंगे"। पूरा जीवन कर्ज़ भरते- भरते बीत जाएगा।
हम सरकार से सिर्फ इतना चाहते है कि हमें ब्लॉक पर बीज मिल जाया करें। इस बार बारिश नही हुआ तो पूरा फ़सल बर्बाद हो गया। ब्लॉक वाला बीज का पहले पैसा माँगता है और कहता है कि 3 महीने के बाद पैसा वापस होगा। पैसा मिल जाएगा ठीक है, लेकिन तत्काल पैसा भी तो होना चाहिए। सरकार बीज दे दे हम अनाज बेच के पैसा दे देंगें।
गांव में सिंचाई की व्यवस्था हो, दो ट्यूबेल है लेकिन उसमें पानी आता ही नही। आता भी है तो आस-पास के लोग ही फायदा उठा पाते है। पाइपें फट चुकी है।
प्रश्न- घर - वर बन गया है न?
ज़बाब-अरे सर पर छत है बस। मतलब घर नही है?
घर का मतलब उसमें खिड़की, दरवाज़ा, लाइन( लाइट) होता है। प्लास्टर होता है। इनसबके बिना क्या कहिएगा? घर तो नहिये कहिएगा।
प्रश्न- फ़ोन पर एक दिन बाउजी से कहा कि मार्केट से 15 रुपये का 100 ग्राम कच्चा हल्दी ख़रीद कर लाया हूँ। वो हैरान थे। उनका कहना था कि हमसे तो 15 रुपया किलो ख़रीदा जाता है
ज़बाब- " अनाज किसान के घर में होता है तो सस्ता, सेठजी के यहाँ जाते है भाव आसमान छूने लगता है"। जिन अनाजो को माटी के भाव बेच देते है घर ख़ाली होने पर उसी अनाज को सोना के भाव पर सेठ से ख़रीदते है।
मेरठ के किसानों की बड़ी मांग कर्ज़ माफ़ी के साथ - साथ गन्ने के फसल को लेकर था। अधिकतर मील बंद हो चुके है। भीड़ की वजह से मिल सिर्फ़ 2 से 3 पर्ची ही देता है बाक़ी का गन्ना मील से आधे दाम पर गुड़ प्लांट को बेचना पड़ता है।
मध्यप्रदेश के कुछ किसान मिले, सरदार सरोवर परियोजना में उनका घर चला गया और आज तक मुआवज़ा नही मिला।
गुजरात के किसान फ़सल बीमा योजना से परेशान है। भावानगर ज़िले के अशोक और नीलेश मिले। सूखे के कारण उनका भी फ़सल बर्बाद हो गया। तहसील में कुछेक जगहों की फसलें थोड़ी ठीक थी बीमा कंपनियों ने उन्ही फसलों की फ़ोटो रिपोर्ट में लगा दिया था। पूरा प्रीमियम भरने के बाद भी इन्हें मुआवजा नही मिला।
फसल बीमा योजना से लगभग हरेक किसान परेशान है। इस योजना के बारे में ग्रामीण या ब्लॉक स्तर पर कोई मददगार भी नही है।
ऐसे सरकारी आंकड़े भी फसल बिमा योजना की हकीकत को बखूबी बयां करते है की किस तरह बिमा कंपनियों को इस योजना का लाभ मिल रहा है जब की एक साधारण किसान अब भी पेड़ से लटकने को या भूखे सोने को मजबूर है।

No comments:

Post a Comment

आपको यह कैसा लगा? अपनी टिप्पणी या सुझाव अवश्य दीजिए।

Post Bottom Ad

Pages