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Sunday, December 30, 2018

ज़िंदगी वो, जो आप बनाएं

राह ने तेरी मुझे मील का पत्थर बना दिया,
मुड़ के देख कभी हम अब भी वहीँ खड़े हैं…
ज़ंजीर नहीं फ़िर भी गिरफ्तार हूँ मैं..
क्या ख़बर थी तुझे ये हुनर भी आता है…!
ये प्रेम, प्यार, इश्क़, मोहब्बत का
एक-एक अक्षर विकलांग क्यों हैं..???

ये वाक्य प्रेम में खोए हुए जोड़े के लिए किसी चीनी की मिठास से कम नहीं हैं। प्रेम में खोया हुआ प्राणी.. आगे क्या होने वाला है सब कुछ भुला देता है। दुनिया की परवाह किए बिना एक होने का सपना संजोय रखता है और कई इस सपने को हक़ीक़त में बदल देते हैं। प्यार में डूबे हुए लोगों को अक्सर ऐसे वाक्यों को एक-दूसरे को भेजते हुए सुना होगा। ये सच्चाई है भी। इस दुनिया में कोई इंसान आपको इतनी शिद्दत से प्यार करता है कि वह समर्पण किए बिना रह नहीं सकता है।

प्रेम का अस्तित्व क्या है? हम प्रेम को समझने में बड़ी भूल कर देते हैं। समाज में एक लड़का और लड़की साथ हैं, कहीं जा रहे हैं तो ये इसे “प्रेम” घोषित कर दिया गया है। इसी समाज मे रहते हुए हमने प्रेम को ही नहीं परखा। इस एक नज़रिए से देखते हुए हमने प्यार को हीन बना दिया है। क्या कोई लड़की सिर्फ अपने पुरुष मित्र से ही प्रेम कर सकती है… क्या यही प्रेम उसके भाई, पिता या माता के लिए नहीं हो सकता। खैर… ये बहस का एक मुद्दा हो सकता है। लेकिन इस बात को समझने में भी कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि हद से ज़्यादा का प्रेम आपको तोड़ सकता है।

प्रेम शब्द का भाव सकारात्मकता से है लेकिन क्या इसमें रहते हुए आप हमेशा सकारात्मक रह सकते हैं? लोगों के कहने के अनुसार इसका जवाब ‘हां’ में होगा।
चलो इसे समझने की कोशिश करते हैं। प्रेम में खोया हुआ मनुष्य सब कुछ छोड़ देने को तैयार रहता है। भविष्य की चिंता किए बिना। एक कहावत है कि कभी-कभी आपकी कामयाबी कई बार आपके लिए परेशानी का सबब बन सकती है। आपकी सफलता भी आपको भीतर से तोड़ सकती है। कहने का मतलब है कि ज़रूरत से ज़्यादा कोई चीज़ अच्छी नहीं होती।
प्रेम में आसक्त हुआ प्राणी खुद को भूलकर दूसरे की खुशी के कार्य करता है। इस बात को भूलकर की क्या उसको ये काम करने में खुशी मिलेगी या नहीं। असल में हम प्रेम को समझ ही नहीं पाए। खुद को भुलाकर मोहब्बत की तो क्या की। हम सब में एक कमी है और वो ये की हम अपने आप से कभी प्यार ही नहीं कर पाते हैं। खुद की खुशी को भुला देते हैं।

अखबारों में रोज़ ही प्रेम की ख़िलाफ़त की खबरें देखने को मिलती हैं। लेकिन क्या वाकई में हम प्रेम करते हैं या सिर्फ लोगों को दिखाने भर के लिए एक दिखावा भर करते हैं। क्या हम अपनी खुशी के मायनों को भी समझ पाए हैं? मेरा ख्याल है नहीं… प्यार में सिर्फ प्यार ही नहीं बल्कि धोखा भी मिलता है। दिल के टूट जाने के बाद फेसबुक, ट्विटर पर उसे बयाँ करने पर बाज नहीं आते हैं। जिस वक्त प्रेम में धोखा मिलता है वो एक बेहद नाजुक क्षण होता है, क्योंकि हम किसी और से प्रेम कर बैठते हैं बजाए अपने आप से। और ये दुनिया तो है ही ज़ालिम। एक सवाल मन में खटकता है कैसे हम अपने आप से प्रेम नहीं कर पाते। क्यों दूसरों के लिए हम अपनी खुशियों पर बट्टा लगा देते हैं। जब दो लोग एक दूसरे से अलग होते हैं तो ये दिल ही नहीं बल्कि दिमाग पर भी इसका असर होता है।

हम प्रेम को अपने आप पर इतना हावी कैसे होने देते हैं। इसका जवाब भी मुझे अपने घर आकर मिला। घर आने पर मैं अपनी एक मित्र से मिलता हूँ। प्रेम में आसक्त हैं.. बस… एक फोन का इंतजार है। क्योंकि जिन्हें वो चाहती हैं उनसे दो दिन बात नहीं हो पाई। फोन नहीं आता है और वो बेचैनी से इसके बारे में बात करती हैं। इस बेचैनी का उत्तर जानने के लिए उनको सवाल दाग दिया..

जवाब: जब आप किसी के फोन का इंतजार करते हैं तो वक्त रुक सा जाता है। अगर आपने कभी किसी के फोन का इंतजार किया होगा तो आप समझ सकते हैं कि मैं क्या कहना चाह रही हूँ। आप बस यही चाहते हैं कि जो चाह रहे हैं वो हो जाए।

उनका जवाब सुनते वक्त में एक टक देखता रहा। खैर… फोन तो आया नहीं लेकिन मैं समझ चुका था।इस बात से दुखी भी कि आप अपने आप से कैसे नियंत्रण खो सकते हैं। किसी के जाने के बाद आपका मन क्यों उदास हो जाता है, क्यों मन बार-बार उसी को पाने की कोशिश करता है। हम खुद को समझा नहीं पाते… इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है।

एक-दूसरे से अलग होने के बाद मन को वीरान कर लेना ज़िंदगी नहीं है। लोग भी तभी चाहते हैं जब आप खुद अपने आप को चाहोगे। अपनी ज़िन्दगी को खुली किताब बनने से बचाइए। किसी के मुताबिक मत जिंदगी जिएं। अपने सपनों को पूरा करें। अपने मकसद को पूरा करें। धरातल बनने से बचें। किसी के आने और जाने से ज़िन्दगी बदलती तो पांडवो के पास तो भगवान कृष्ण थे, वो भी एक समय उन्हें छोड़कर चले गए। अपनी परेशानी को अपनी मजबूती बनाएं।
एक मित्र की बात को दोहरा रहा हूँ कि आप चाहे कितने भी भावनात्मक न हों जाएं, आप तभी स्वीकार किए जाएंगे जब आप दूसरों के कंफर्ट ज़ोन के सांचे में ढलेंगे। आपको अपने रास्ते खुद ही तय करने होंगे। आपके साथ कितने ही लोग क्यों न जुड़े हों लेकिन वो तभी काम आएंगे जब आप अपना वजूद पहचानोगे। आपकी सबसे बड़ी कामयाबी यही है कि आपका अस्तित्व कायम है। अपने अस्तित्व की रक्षा करना आपके पहला कर्तव्य है। अपने आप औए अपने जज़्बातों के लिए फिक्रमंद रहिए। किसी से इतना भी मन न लगाएं की अन्ततः आप दुखी होकर टूट जाएं।

अपने सपनों और अस्तित्व के लिए लड़ते रहिए। ज़िन्दगी वही है जो आप बनाते हैं वो नहीं जो दूसरे आपके लिए निर्धारित करते हैं। उम्मीद का दामन थामे रहिए। वरना प्रेम की दास्तान तो ऐसी है कि हम अपने आप को खो बैठते हैं। रील और रियल ज़िन्दगी के अंतर को समझें। अंत में आप ही अपनी उम्मीद हैं। स्वंय के आत्म-सम्मान की रक्षा करें अन्यथा ये ज़िन्दगी जितनी प्यारी है उतनी बेरहम भी है..


प्रदीप कुमार(हिंदी पत्रकारिता)

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