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Thursday, December 27, 2018

मिर्ज़ा ग़ालिब-(दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला)


आइए आज कुछ आशिक मिजाज और ग़ालिब से वाबस्ता रखने वालों को ग़ालिब की बल्लीमारान लेकर चलते हैं।वह गली जहां पर ग़ालिब की हवेली है। जहां पर उन्होंने जिंदगी के कई वर्ष गुजारे हैं। लाल किले के ठीक सामने से जाती हुई नई सड़क पर बल्लीमारान  नाम की गली कटी हुई है। उस गली में 300 मीटर के लगभग अंदर की तरफ जाने के बाद बाएं हाथ लगभग ढाई शताब्दी पुरानी हवेली बनी हुई है। वैसे अगर आप बिना ध्यान दिए निकल जाएंगे तो आपको उसके बारे में कुछ पता भी नहीं चल पाएगा।क्योंकि वहां पर बनी सभी पुरानी इमारतों की तरह वह भी बनी हुई है।उसके गेट पर कुछ खास पहचान के लिए नहीं लगा हुआ है,सिवाय एक छोटे से बोर्ड के।



अंदर प्रवेश करते ही आपको दाहिने हाथ पर एक छोटा कमरा दिखाई देगा जिसमें ग़ालिब की दो रचनाएं और उनकी एक मूर्ति लगी हुई है। जहां पर कुछ उनकी प्रसिद्ध शायरी और दो पत्रों को लिखकर टांगा गया है।कमरे से निकलकर फिर आगे चार कदम बढ़ते हैं  तो उसके दाहिनी तरफ दीवार है और बाई तरफ लगभग १०-१२ मीटर लंबी गैलरी है। जहां पर उनसे संबंधित कुछ पुस्तकें,उनकी प्रयोग की हुई सामग्री, उनका उनके द्वारा खेले जाने वाला शतरंज और आसन पर बैठी हुई मूर्ति लगी हुई है । साथ ही उनकी लिखी हुयी शायरियों का एक दस्तावेज  भी रखा हुआ है। 


वैसे ग़ालिब का जन्म काले महल हवेली पीपल मंडी बाजार,आगरा  में हुआ था उनका पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब था।उनका जन्म २७ दिसंबर १७९७ को हुआ था।उनका बचपन उनके ननिहाल में ही बिता था।उनकी शिक्षा किसी स्कूल कॉलेज में नहीं हुई थी।उनके माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे।उनकी परवरिश उनके चाचा मिर्जा नसरुल्लाह बेग ने की थी। लगभग १०-१२ वर्ष की उम्र में वह दिल्ली आ गए थे।उनका विवाह बेगम उमराव से हुआ,जो उस वक्त १३ वर्ष की थी।

शेरो-शायरी के रसिया मिर्ज़ा ग़ालिब बचपन से ही मोमिन मीर और जाक से  प्रभावित थे।शायद यही बात थी उन्होंने मीर के लिए एक शेर लिखा था,


रेख्ता के तुम ही उस्ताद नहीं हो ग़ालिब,
कहते हैं अगले जनम में कोई मीर भी था।
चूँकि ग़ालिब को बड़ा स्वाभिमान था और अपने पर पूर्ण आत्मविश्वास रखते थे ,उन्होंने एक शेर कहा है,
हैं और भी दुनियां में सुखनवर बहुत अच्छे,
कहते है ग़ालिब का अंदाज-ए-बयाँ और है। 
ग़ालिब की पत्नी उमराव पतिव्रता,निष्ठावान और वफादार पत्नी थी।ग़ालिब का भरपूर ध्यान रखती थी।लेकिन ग़ालिब उनसे शिकायत करते रहते थे कि वह कभी उनकी शायरी कि प्रशंसा नहीं करती हैं।उनके ७ बच्चे थे लेकिन दुर्भाग्य से एक भी जीवित नहीं रहा था।हालाँकि  उमराव को मिर्जा की एक भी शायरी पसंद नहीं आती थी, लेकिन उन्होंने कभी इसकी शिकायत नहीं की।

अम्बरीश कुमार (हिंदी पत्रकारिता)

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