द्वन्द और संघर्ष के इर्द-गिर्द बुना गया है "खामोशी सीली सीली।"
20वें भारत रंग महोत्सव राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में जारी है। इसबार अनेकों नाटक 21 फरवरी 2019 तक प्रस्तुत किए जायेंगे। 8 फरवरी को मैं भी अपने दोस्तों के साथ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय पहुँच गया। और मौका मिला अभिमंच पर "खामोशी सीली सीली" देखने का।
अमेरिकी नाटककार जोसेफ स्टेन के 1964 में लिखे म्युजिकल नाटक फिडलर ऑन द रूफ पर फिल्म भी बन चुकी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सुरेश शर्मा ने इसे रूस और यहूदी परिवेश से बाहर निकालकर नब्बे की खलबली वाली कश्मीर की वादी और कश्मीर पंडित पर उतारा है।
ज्यादा बोलने वाली पत्नी और अपने सपनों में जीती बेटियों के साथ रहने वाले सरल स्वभाव के नानबाई पृथ्वीनाथ परंपराओं और अंतरात्मा के द्वंद्व में फंसे हैं। पहले तयशुदा रिवाजों की दुहाई और दूसरे ही पल मोनोलॉग में दिल का कहा मानते हुए बेटियों को मन का करने की इजाजत देते रहते हैं।
पांच बेटियों वाले और दूध बेचकर गुजारा करने वाले पृथ्वीनाथ के जीवन में समस्या बहुत है। इसके बावजूद उसकी सबसे बड़ी फिक्र अपनी परंपराएं और रीतिरिवाज को बचाए रखने की है। लेकिन दूसरे धर्म के प्रेमी से शादी की जिद पर उतरी बेटी उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाती है।
धीरे-धीरे कश्मीर में हालात बिगड़ते हैं और पृथ्वीनाथ के पूरे समाज को वादी छोड़ने का फरमान आ जाता है। नाटक की प्रासंगिकता 'जाएगा क्या साथ हमारे' गीत से और ज्यादा मजबूत हो जाती है।
दो घंटे बीस मिनट के नाटक का अंत दुखांत होने के बावजूद सहज लगा,क्योंकि ज्यादातर पात्र परिस्थिति के हाथों गुलाम हैं। वे समस्याओं,परंपराओं और द्वन्द से आजादी चाहते हैं। अतः खामोशी भले सीली सीली हो लेकिन मौजूद है सभी पात्र में।
----------------------------------------------------------------------
भारतीय जन संचार संस्थान , नई दिल्ली से राहुल कुमार दोषी का लेख.

No comments:
Post a Comment
आपको यह कैसा लगा? अपनी टिप्पणी या सुझाव अवश्य दीजिए।