क्या है हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन
हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन मलेरिया की पुरानी दवा है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस दवा का आविष्कार किया गया था। बर्लिन के चैराइट यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के रुमेटोलॉजिस्ट थॉमस डोर्नर ने कहा, 1940 के दशक से ही प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़े रोगों के उपचार में मलेरियारोधी दवा क्लोरोक्विन और इसके उन्नत रूप हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन का इस्तेमाल हो रहा है।
पिछले कुछ दशकों में इस दवा ने एक प्रभावी वायरसरोधी एजेंट के रूप में विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है। हाल ही कर एक शोध के माध्यम से भी कहा गया है कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन कोरोना पीड़ित के इलाज में काम आ सकती है। भारत ने पिछले महीने इस दवा के निर्यात पर रोक लगा दी थी। जब से यह खबर सामने आई कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन कोरोना के इलाज में सकारात्मक परिणाम दे रही है, तब से इसकी बिक्री में अचानक से बड़ी तेजी आई
क्या है स्थिति
हाल ही में इस दवा से जुड़ी खबर में भारत तब शामिल होे गया, जब भारत ने दवा के निर्यात पर अपनी घरेलू जरूरतों को देखते हुए प्रतिबंध लगा दिया...और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से इस दवा की आपूर्ति को लेकर सख्त लहजे में गुहार लगाई।
इंडियन फार्मास्यूटिकल एलायंस (आईपीए) के महासचिव सुदर्शन जैन के अनुसार, दुनिया में आपूर्ति होने वाली कुल हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन में भारत की हिस्सेदारी 70 फीसदी है। देश में हर महीने 40 टन हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का उत्पादन होता है।
इस दवा को लेकर भारत क्यों है अहम
हाल ही में, भारत सरकार ने एक फार्मा कंपनी को 71 लाख लोगों के इलाज को ध्यान में रखकर 10 करोड़ टेबलेट के आर्डर दिए है। भारत में HCQ की एक टैबलेट की कॉस्ट 3 रुपये से कम होती है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि 7 करोड़ मरीजों को ठीक करने के लिए 10 करोड़ टैबलेट काफी हैं। ऐसे में बाकी प्रॉडक्शन का निर्यात किया जा सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका, ब्राजील, जर्मनी और स्पेन जैसे देशों में Hydroxychloroquine की सबसे ज्यादा मांग है। लगभग 30 देशों ने इस दवा के सप्लाई की अपील भारत सरकार से की है। सरकार ने भी अपनी समुचित आपूर्ति का आकलन कर उन देशों को दवा निर्यात करने का आश्वासन दिया है।
