अच्छा आजकल एक ट्रेंड चल पड़ा हैं, रावण के व्यक्तित्व को अच्छे से सजा कर पेश करने का। रावण विद्वान था, ज्ञानी था, महाशक्तिशाली था..फलाना ढिमकाना। एक तरफ जहाँ रावण की तमाम बुराइयों को छोड़कर लोग उसके कसीदे पढ़ रहे हैं, वही दूसरी तरफ राम की तमाम अच्छाईयों को दरकिनार कर लोग उनके अस्तित्व पर ही सवाल उठा रहे हैं। मतलब साफ हैं कि प्रेम, सौहार्द, करुणा और शालीनता को बगल में रखकर छल, कपट, घृणा और अहंकार को हम तरजीह देने लगे हैं। शायद यही कलयुग हैं।
राम और रावण दोनों भारत की संस्कृति का हिस्सा हैं लेकिन राम भारत की आत्मा से जुड़े हुए हैं। रावण ने भी अपने विशाल आभामंडल द्वारा अपनी छाप जरूर छोड़ी हैं लेकिन फिर भी वह साधारण से दिखने वाले राम के आगे फीके लगे हैं। रावण अहंकार, घमंड और घृणा के पर्यायवाची से ज्यादा कुछ नही।
बात सिर्फ विद्वता व ज्ञान की नही होती.. उस ज्ञान का कैसे, कब और किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा, यह व्यक्ति की पहचान को दर्शाता हैं। अच्छाई और बुराई हर इंसानों में होती हैं लेकिन देखना यह हैं कि कही आपकी बुराई का अनुपात इतना तो नही बढ़ गया की उसके सामने आपकी अच्छाई कही दिख भी नही रही।
यकीन मानिये, हर हिन्दू पर्व त्यौहारों पे अपना सस्ता ज्ञान पेश कर और ढोंगी ज्ञान का तड़का लगाकर खुद को भीड़ से हटकर दिखाने की कोशिश जो आप करते हैं कसम से डेकोरेटेड मुर्ख ही लगते हैं!!
दशहरा पर्व हैं रावण को नकारने का और राम की महत्ता को स्वीकारने का। विजयदशमी का त्यौहार सिर्फ इतना ही सन्देश देता हैं कि अगर आपके पास बल हैं, शक्ति हैं, धन हैं तो उसका सही दिशा में इस्तेमाल कीजिये। समाज के कल्याण में अपना योगदान दीजिये। और हो सके तो इस पर्व के नायक राम को समझने, उनसे सिखने व उन्हें आत्मसात करने की कोशिश कीजिये।
आप सभी को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।




nice sir i m big fan of u ashish jha god bless u and keep it up.
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