सांझ के वक़्त
जब सूर्य और चंद्र दोनों अलसाये होंगे
और
जब मैं स्वयं को
अपनी अनंत दुवधाओं से निजात पाने
की कला से प्रशिक्षित कर रहा होऊँगा,
तब तुम दबे पाँव आना
और मेरे कानों में धीरे से कहना,
मैं तुमसे प्रेम करती हूँ '
फिर प्रतीक्षा करना,
मेरे होंठों पर उस मुस्कान के आने की
जिसके बाद कुछ और पाने की
आवश्यकता ना लगे।।
फिर,
फिर चली जाना,
मेरे शरीर को कपास की तरह
उड़ता छोड़कर
बिल्कुल धरती और आकाश के मध्य...
सिद्ध यह करना है
कि
प्रेम होना उतना आवश्यक नहीं है
जितना प्रेम में होना आवश्यक है...।

बढ़िया लगा जी
ReplyDeleteHEARTTOUCHING
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